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Uniform Civil Code in Maharashtra: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता की ओर बढ़े कदम, सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किया 7 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन; सेवानिवृत्त जज रंजना देसाई करेंगी अध्यक्षता

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए एक मसौदा (ड्राफ्ट) प्रस्ताव तैयार करने के लिए सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के गठन की घोषणा की है. सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई इस समिति की अध्यक्षता करेंगी.

Uniform Civil Code in Maharashtra: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता की ओर बढ़े कदम, सीएम देवेंद्र फडणवीस ने किया 7 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन; सेवानिवृत्त जज रंजना देसाई करेंगी अध्यक्षता
सीएम देवेंद्र फडणवीस (Photo Credits: ANI)

मुंबई: उत्तराखंड (Uttarakhand) के बाद अब महाराष्ट्र भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) को लागू करने की दिशा में औपचारिक रूप से आगे बढ़ गया है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री (Maharashtra Chief Minister) देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने राज्य विधानसभा के चल रहे मानसून सत्र के दौरान एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के गठन का ऐलान किया. यह समिति राज्य में यूसीसी को लागू करने के लिए एक व्यापक कानूनी मसौदा तैयार करेगी. इस उच्च स्तरीय समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश (रिटायर्ड जस्टिस) रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है. इस कदम के साथ ही महाराष्ट्र में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करने की विधायी प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है. यह भी पढ़ें: मुंबई बारिश पर विधानसभा में तकरार: सीएम फडणवीस का विपक्ष को करारा जवाब; आंकड़ों से समझाया बारिश का रौद्र रूप, पुराने 'नाला सफाई घोटालों' पर कसा तंज

6 महीने में रिपोर्ट सौंपेगा पैनल; शीतकालीन सत्र में बिल लाने की तैयारी

विधानसभा में घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली यह समिति अगले छह महीनों के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी. सरकार की योजना इसके बाद आगामी नागपुर शीतकालीन सत्र में इस संबंध में विधेयक (बिल) पेश करने की है.

जस्टिस देसाई के अलावा इस 7 सदस्यीय पैनल में कई अन्य कानूनी व प्रशासनिक विशेषज्ञों को शामिल किया गया है:

  • जस्टिस आर. सी. चव्हाण (पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश)
  • जस्टिस एस. जी. मेहरे (पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश)
  • डी. के. जैन (महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव)
  • वीरेंद्र सराफ (पूर्व महाधिवक्ता - एडवोकेट जनरल)
  • रमेश पतंगे (संवैधानिक विशेषज्ञ)
  • सुवर्णा रावल (प्रख्यात शिक्षाविद)

डॉ. आंबेडकर के विजन और महिला अधिकारों का दिया हवाला

मुख्यमंत्री ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार भारतीय संविधान में निहित 'राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों' (Directive Principles of State Policy) के अनुरूप है और यह संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर के मूलभूत विजन को दर्शाता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि समानता और एकरूपता के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए एक समान नागरिक ढांचा बेहद आवश्यक है.

यह निर्णय हाल ही में विधानसभा में तीन तलाक के बढ़ते मामलों और व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) में भिन्नता के कारण महिलाओं के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर हुई चर्चा के बाद लिया गया है. गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने सरकार का रुख साफ करते हुए कहा कि राज्य इस विषय पर पूरी तरह सकारात्मक है और यूसीसी के माध्यम से महिलाओं को समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करने और बहुविवाह (पॉलीगैमी) पर रोक लगाने का इरादा रखता है.

उत्तराखंड के बाद अब महाराष्ट्र की बारी; विपक्ष ने दी आम सहमति की सलाह

पैनल की अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई के पास इस क्षेत्र का व्यापक अनुभव है. वे इससे पहले उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता ड्राफ्टिंग कमेटी की भी अध्यक्षता कर चुकी हैं, जो आजादी के बाद यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना था. महाराष्ट्र की यह समिति अब मौजूदा कानूनी ढांचों का अध्ययन करेगी, उत्तराखंड, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे अन्य राज्यों की सिफारिशों का विश्लेषण करेगी और अंतिम मसौदा तैयार करने से पहले आम जनता व विभिन्न संगठनों के प्रतिवेदनों की समीक्षा करेगी.

सत्तारूढ़ गठबंधन ने इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है, क्योंकि समान नागरिक संहिता उनके प्रमुख वैचारिक उद्देश्यों में से एक रही है. वहीं, विपक्षी नेताओं ने इस पर सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने का आग्रह किया है. कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधियों का कहना है कि हालांकि यूसीसी का संवैधानिक आधार मान्य है, लेकिन सरकार को अंतिम विधेयक सदन में पेश करने से पहले कानूनी विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं और विभिन्न समुदायों के नेताओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श करके एक समावेशी आम सहमति (कंसेंसस) सुनिश्चित करनी चाहिए.

(The above story first appeared on LatestLY on Jul 09, 2026 02:57 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).