ऐतिहासिक गिरावट के बाद रुपये को संभालने की कोशिश
पश्चिम एशिया संकट और महंगे तेल के कारण भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है.
पश्चिम एशिया संकट और महंगे तेल के कारण भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. सरकार और रिजर्व बैंक हस्तक्षेप कर रहे हैं, लेकिन विदेशी निवेश निकासी और बढ़ते घाटे से दबाव बना हुआ है.पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे जुड़ी बढ़ती तेल कीमतों के बीच भारत अपनी गिरती मुद्रा रुपये को संभालने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है. देश की अर्थव्यवस्था, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है, इस दबाव के कारण अस्थिरता झेल रही है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी में संकट शुरू होने के बाद से रुपया पांच प्रतिशत से अधिक कमजोर हुआ है. इस गिरावट के कारण 2025 से चली आ रही कमजोरी इस कदर बढ़ गई है कि रुपया 2026 में एशिया की प्रमुख मुद्राओं में इसे सबसे कमजोर हो गया है. शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 96 से ऊपर के स्तर तक गिर गया, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर है.
इस स्थिति को देखते हुए सरकारी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि रुपये की और गिरावट को रोकना अब एक प्रमुख व्यापक आर्थिक प्राथमिकता बन गया है. भारतीय रिजर्व बैंक पहले ही मुद्रा को स्थिर करने के लिए अरबों डॉलर बाजार में झोंक चुका है. इसके अलावा सट्टा कारोबार पर नियंत्रण के कदम उठाए गए हैं और तेल आयातकों के लिए विशेष ऋण सुविधा भी दी गई है, ताकि डॉलर की मांग को कम किया जा सके.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आयात पर नियंत्रण के लिए विदेशी मुद्रा पर कम खर्च करने की अपील की है. इसमें सोने की खरीद कम करना और एक वर्ष तक विदेशी यात्राओं में कमी जैसे उपाय शामिल हैं. इसके बावजूद रुपये पर दबाव लगातार बना हुआ है.
महंगे तेल से बढ़ी चुनौती
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के दिलीप परमार कहते हैं कि "पूरा तंत्र प्रभावित हो चुका है.” उन्होंने बताया कि विदेशी निवेशकों की भारी निकासी, कमजोर होते आर्थिक संकेत और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें रुपये पर दबाव का मुख्य कारण हैं. उनके अनुसार डॉलर की मांग अधिक होना और आपूर्ति कम रहना इस गिरावट की मूल वजह है.
भारत का चालू खाता घाटा भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण महंगे ऊर्जा आयात हैं. बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज के अनुमान के अनुसार, यह घाटा चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद का दो प्रतिशत से अधिक हो सकता है, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुना है और संभवतः 2012‑13 के बाद सबसे अधिक स्तर हो सकता है.
रिपोर्ट्स बताती है कि मध्य पूर्व संघर्ष शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 20 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है, जो अब तक की सबसे तेज दर है. इसी दौरान डॉलर का प्रवाह भी धीमा पड़ा है, जिससे भुगतान संतुलन में 67 से 88 अरब डॉलर तक का अंतर पैदा होने की आशंका है.
एएनजेड रिसर्च के अर्थशास्त्री धीरज निम ने कहा कि 2027 वित्त वर्ष लगातार तीसरा वर्ष होगा जब भारत भुगतान संतुलन घाटे का सामना करेगा, जो एक असामान्य स्थिति है. इस दबाव के चलते रिजर्व बैंक को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करना पड़ा है.
देश का विदेशी मुद्रा भंडार अब लगभग 697 अरब डॉलर रह गया है, जो मध्य पूर्व संकट से पहले 720 अरब डॉलर से अधिक था. हालांकि यह अभी भी लगभग 11 महीनों के आयात को कवर करता है, लेकिन इसमें आई गिरावट दबाव को दिखाती है.
घरेलू अर्थव्यवस्था पर असर
रुपये की गिरावट का असर देश के भीतर भी दिख रहा है. कई विनिर्माण और खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां, जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं, लागत में तेजी से वृद्धि का सामना कर रही हैं. छोटे उद्योगों के पास मुद्रा जोखिम से बचने की सीमित क्षमता होती है, जिससे उनकी स्थिति और मुश्किल हो जाती है.
केरल के काजू उद्योग में इसका प्रभाव विशेष रूप से देखा जा रहा है. यहां अधिकांश कच्चा माल अफ्रीका से आयात किया जाता है. एक उद्योगपति राजमोहन पिल्लै ने कहा कि "स्थानीय बाजार के लिए आयात बहुत महंगा हो गया है.” उनके अनुसार खरीदार अब पिछले वर्ष की तुलना में केवल लगभग 90 प्रतिशत ही खरीद कर पा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में 80 प्रतिशत से अधिक प्रसंस्करण इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिसमें रुपये की अस्थिरता एक प्रमुख कारण रही है.
रुपये की कमजोरी का असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों पर भी पड़ा है. शिक्षा सलाहकारों के अनुसार, अमेरिका में पढ़ाई की लागत अब पिछले वर्ष की तुलना में 10 लाख रुपये से बढ़ गई है. 17 वर्षीय छात्रा मेघना सेन ने कहा, "अब हमें अपने दैनिक खर्च के लिए भी रुपये की चाल पर नजर रखनी पड़ती है.” उन्होंने इसे "आखिरी झटका” बताया.
रुपये की गिरावट ने भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाबनने के लक्ष्य को भी प्रभावित किया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, डॉलर में जीडीपी की गणना होने के कारण भारत अब ब्रिटेन से पीछे छठे स्थान पर पहुंच गया है.
आगे की संभावित नीतियां
नोमुरा के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि सरकार को और कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं. इनमें ईंधन कीमतों में वृद्धि, विदेश भेजी जाने वाली राशि पर नियंत्रण और गैर निवासी भारतीयों से डॉलर जमा आकर्षित करने जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं. ये उपाय पहले भी संकट के समय अपनाए जा चुके हैं.
हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि हस्तक्षेप केवल अस्थिरता को कम कर सकता है, मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता. धीरज निम के अनुसार "मूलभूत कारकों” को ठीक करना जरूरी है और भविष्य की मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए ब्याज दर बढ़ाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक के पास विकल्प मौजूद हैं, अब देखना यह है कि वह किस दिशा में कदम उठाता है.
(The above story first appeared on LatestLY on May 17, 2026 04:31 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

