सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में निचली अदालतों की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए सख्त निर्देश जारी किए हैं. केवल अपराध की गंभीरता के बजाय आरोपी की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों की रिपोर्ट का मूल्यांकन करना जरूरी.भारत में मौत की सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल को एक अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि केवल अपराध की क्रूरता देखकर फांसी नहीं दी जा सकती. आरोपी को दोषी करार देने के बाद और सजा तय करने से पहले ट्रायल कोर्ट को सजा को कम करने वाले (मिटिगेटिंग फैक्टर) और बढ़ाने वाले (एग्रिवेटिंग फैक्टर) हालात पर रिपोर्ट मंगानी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मौत की सजा पाने वाले दोषियों की ओर से वरिष्ठ वकील पेश हों, ताकि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई और बेहतर कानूनी सहायता मिल सके. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच पटना हाई कोर्ट के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी, जहां ट्रिपल मर्डर मामले में अमन सिंह को मौत की सजा सुनाई गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अमन सिंह की सभी अपीलों पर अंतिम फैसला आने तक उनकी फांसी की सजा पर रोक जारी रहेगी. मामले की प्रभावी सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट और पटना हाई कोर्ट से केस रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज भी मंगाए हैं.
अदालत ने क्या कहा?
शीर्ष अदालत ने 'मनोज और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले का जिक्र किया. इसमें फांसी से जुड़े मामलों में सजा तय करने की प्रक्रिया को लेकर दिशानिर्देश बताए गए हैं. ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी सिर्फ आरोपी को दोषी ठहराना और मौत की सजा सुना देना भर नहीं है. उसे सजा कम करने वाले कारकों के बारे में भी जानकारी जरूर लेनी चाहिए. जिसके लिए दोषी की 'मिटिगेशन रिपोर्ट' ली जाती है. मौत की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जाए जहां सुधार की कोई संभावना न बची हो.
सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल को दिए अपने 13 पन्नों के आदेश में कहा, "अक्सर ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट सजा सुनाने से पहले उन जरूरी रिपोर्टों को नहीं मंगाते जिनसे यह समझा जा सके कि आरोपी की परिस्थितियां, मानसिक स्थिति, जेल में उसके व्यवहार, मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और निजी पृष्ठभूमि क्या थी. जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तब पहली बार ये जानकारी जुटाई जाती है. देरी होने से यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि आरोपी को सुधारने का मौका मिल सकता था या नहीं. अगर शुरुआत में ही आरोपी से जुड़ी पूरी जानकारी सामने आ जाए, तो अदालत ज्यादा संतुलित और निष्पक्ष फैसला ले सकती है."
रिपोर्ट की अनदेखी और बढ़ती बरी होने की दर
आंकड़े बताते हैं कि सेशंस कोर्ट ने इन निर्देशों का पालन पांच प्रतिशत से भी कम मामलों में किया. आरोपी को दोषी ठहराने के तुरंत बाद बिना रिपोर्ट देखे ही मौत की सजा दे दी जाती है. नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (नालसर) विधि विश्वविद्यालय के 'स्क्वायर सर्कल क्लिनिक' ने इस साल फरवरी में, 'डेथ पेनल्टी इन इंडिया' रिपोर्ट जारी की. इसकी माने तो हत्या और यौन अपराध जैसे जिन मामलों में निचली अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई, उनमें बड़ी संख्या में दोषी बरी हो गए. पिछले दस वर्षों में हाई कोर्ट ने 191 मामलों में 326 लोगों और सुप्रीम कोर्ट ने 38 लोगों को बरी किया.
रिपोर्ट में कई ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है जिनमें ऊपरी अदालतों ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए. कई मामलों में गवाहों को प्रभावित करने, झूठे सबूत, दबाव में कबूलनामा लेना और डीएनए साक्ष्यों के आरोपों से मेल न खाने जैसी गंभीर खामियां सामने आईं. कानून के प्रोफेसर और 'स्क्वेयर सर्कल क्लिनिक' के एग्जीक्यूटिव निदेशक अनूप सुरेंद्रनाथ ने डीडब्ल्यू से बात की.
वह बताते हैं, "हत्या जैसे गंभीर मामलों में कानून के तहत उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान है. मौत की सजा देने से पहले अदालत को निश्चित प्रक्रिया का पालन करना जरुरी होता है. इसका मतलब यह नहीं है कि कमजोर सबूतों के आधार पर किसी को दोषी ठहरा दिया जाए. यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है."
क्यों दिखती है इन नियमों की अनदेखी?
अनूप सुरेंद्रनाथ का कहना है कि यह केवल अनुमान लगाया जा सकता है कि ट्रायल कोर्ट कई बार तय दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन किए बिना इतनी आसानी से मौत की सजा क्यों सुना देती हैं. अदालतों पर मामलों का भारी बोझ है और वे फैसले देने में अधिक देरी नहीं करना चाहतीं. मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील के जरिए लंबी कानूनी प्रक्रिया में जाता है. फैसले में दस साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. तब तक व्यक्ति 'डेथ रो' में रहता है.
डीडब्ल्यू ने पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राष्ट्रीय सचिव लारा जेसानी से बात की. वह बॉम्बे हाई कोर्ट में अधिवक्ता भी हैं. लारा ने बताया कि हत्या, गैंगरेप या राजनीतिक मामलों में अक्सर जनता और मीडिया की ओर से अदालतों पर मौत की सजा सुनाने का दबाव बनाया जाता है. वह कहती हैं कि इसका असर न्यायाधीशों के निर्णयों पर दिखाई देता है, जो चिंताजनक है.
लारा कहती हैं, "मौत की सजा देने से समाज में अपराध कम नहीं होता. दोषियों के परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है. उम्रकैद कहीं अधिक डरावना है. कई प्रगतिशील देशों जैसे कनाडा, जर्मनी और फ्रांस में इस तरह की सजा पर प्रतिबंध है. भारत को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए."
क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश
ऐसे मामले उच्च न्यायालयों पर भी अतिरिक्त बोझ बढ़ाते हैं. सेशंस कोर्ट में मौत की सजा की पुष्टि हाई कोर्ट करता है. जिसके बाद आरोपी के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने और दया याचिका दायर करने का विकल्प होता है. इस पूरी लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति दशकों तक जेल में मौत के डर में रहता है.
इस बार सुप्रीम अदालत ने साफ किया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मौत की सजा की पुष्टि से जुड़े हर मामले में 'लीगल सर्विस समिति' दोषी के लिए एक विशेष कानूनी टीम उपलब्ध कराएगी. इस टीम में एक वरिष्ठ अधिवक्ता और कम से कम सात वर्षों का अनुभव रखने वाले दो वकील शामिल होंगे, जो दोषी का पक्ष रखेंगे.
राज्य सरकारों को रिपोर्ट का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश दिया. जेल प्रशासन हिरासत के दौरान अपीलकर्ताओं के व्यवहार, कामकाज और आचरण से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट बनाए. यह अदालत में पेश की जानी चाहिए. साथ ही सरकारी मेडिकल संस्थान के जरिए अपीलकर्ताओं का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराना होगा.













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