उत्तर प्रदेश में पत्रकार की हत्या का ‘लेखपाल कनेक्शन’
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

यूपी के सीतापुर में पत्रकार राघवेंद्र वाजपेयी की 8 मार्च को हत्या हुई. पुलिस को इस मामले में सफलता ना मिलने के बाद ये मामला स्पेशल टास्क फोर्स को सौंपा गया है. राज्य में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे हैं सवाल.सीतापुर के महोली कस्बे में एक अखबार के लिए काम कर रहे पत्रकार राघवेंद्र वाजपेयी की आठ मार्च को कुछ बंदूकधारियों ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी. पुलिस ने छह लेखपालों समेत दो दर्जन से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया है, महोली कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक समेत कुछ पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है लेकिन किसी की गिरफ्तारी अब तक नहीं हुई है.

घटना के तीन दिन बाद सीतापुर के पुलिस अधीक्षक चक्रेश मिश्र ने मीडिया को बताया था कि पुलिस की कई टीमें लगी हुई हैं और जल्दी ही अभियुक्तों का पता लगा लिया जाएगा. इस बीच, महोली कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक विनोद कुमार मिश्र, घटनास्थल से संबंधित चौकी प्रभारी सतीश चंद्र और कांस्टेबल राजकुमार और नरेन्द्र मोहन को निलंबित कर दिया गया है.

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हत्या की गुत्थी सुलझाने में पुलिस के असफल रहने और एक भी गिरफ्तारी ना होने के बाद अब ये मामला स्पेशल टास्क फोर्स को सौंपा गया है.

संसद में उठा मुद्दा

चार दिन बीत जाने के बावजूद किसी की गिरफ्तारी ना होने को लेकर राज्य भर के पत्रकारों ने गुस्सा दिखाया और जगह-जगह प्रदर्शन किए. इसके अलावा इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की सरकार को संसद में भी विपक्ष ने घेरा है. धौरहरा लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदौरिया ने यह मुद्दा लोकसभा में उठाया और मांग की है कि परिवार को पचास लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी मिले.

राघवेंद्र वाजपेयी के परिजनों के मुताबिक, आठ मार्च को दोपहर करीब दो बजे उनके पास एक फोन आया और राघवेंद्र वाजपेयी ये कहकर अपनी बाइक से निकल पड़े कि तहसीलदार ने बुलाया है. घर से निकलने के करीब एक घंटे बाद ही उनकी हत्या की खबर आ गई. पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है.

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राघवेंद्र वाजपेयी की पत्नी रश्मि वाजपेयी ने डीडब्ल्यू को बताया, "खबरों के सिलसिले में वो अक्सर इसी तरह बताकर निकल जाते थे. तो हमें कोई हैरानी नहीं हुई. उन्होंने बताया था कि तहसीलदार ने बुलाया है और उनसे मिलने सीतापुर जा रहे हैं लेकिन हाईवे पर ही उनकी हत्या कर दी गई.”

लेखपाल की भूमिका संदिग्ध

इस मामले में महोली तहसील के चार लेखपालों समेत कई लोगों को हिरासत में लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है लेकिन अब तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया है कि हत्या के पीछे कुछ और कारणों की भी तलाश की जा रही है. हालांकि परिजनों का कहना है कि राघवेंद्र वाजपेयी तहसील में जमीन खरीद और धान खरीदी में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार खबरें लिख रहे थे जिसकी वजह से उनकी हत्या हुई है. लेखपालों की भूमिका भी इसीलिए इस मामले में संदिग्ध मानी जा रही है.

लेखपाल, राजस्व विभाग के ग्राम स्तर के अधिकारी होते हैं. कुछ जगहों पर उन्हें पटवारी भी कहा जाता है. लेखपाल का मुख्य काम, गांव में जमीन से जुड़े काम देखना और जमीन का लेखा-जोखा रखना होता है. लेखपाल, सरकार की नीतियों को ग्राम स्तर पर लागू करते हैं.

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक, सीतापुर में जमीन की खरीद-बिक्री का खेल पिछले कई साल से चल रहा है. राघवेंद्र वाजपेयी इसे और धान खरीदी में भ्रष्टाचार को लेकर लगातार खबरें लिख रहे थे. यही नहीं, जमीन की खरीद के अलावा अनाज की खरीद में भ्रष्टाचार को लेकर भी सीतापुर जिला पहले से चर्चा में रहा है.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ल कहते हैं, "सीतापुर में खाद्यान्न घोटाले की पृष्ठभूमि रही है. करीब दो दशक पहले का चर्चित खाद्यान्न घोटाला जिसकी सीबीआई चांच भी हुई, उसका केंद्र भी सीतापुर और गोंडा था. इसके अलावा भी कई घोटाले यहां हुए हैं. इन सब मामलों में अगर कार्रवाई हुई होते तो घोटाला करने वालों के हौसले पस्त होते. लेकिन ये सिंडीकेट इतना मजबूत है कि ना तो किसी को कोई सजा हुई और न ही किसी का कुछ नुकसान हुआ. ऐसे लोगों को राजनीतिक प्रश्रय भी मिल रहा है तो जाहिर है उन्हें घोटाले की खबर लिखने वाले पत्रकार की जान लेने से भी गुरेज नहीं है.”

ज्ञानेंद्र शुक्ल बताते हैं कि पिछले खाद्यान्न घोटाले में भी सुधीर रूंगटा नाम के एक तहसीलदार की हत्या की गई थी. यही नहीं, सीबीआई के अफसरों तक पर हमले हुए थे. कई अफसरों पर भी सवाल उठे थे लेकिन किसी को सजा नहीं हुई और मामला दबा दिया गया.

पत्रकारों पर हमले

यूपी में पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं और कई पत्रकारों की जान भी जा चुकी है. अभी पिछले साल अक्तूबर में ही फतेहपुर जिले में एक पत्रकार दिलीप सैनी की भी हत्या की गई थी. सरकार और प्रशासन की खामियों को उजागर करने वालों के पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाना तो बहुत आम बात है.

सीतापुर के ही एक पत्रकार नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "पत्रकारों पर इस बात का लगातार दबाव रहता है कि वो प्रशासन और पुलिस की तारीफ में ही खबरें लिखें. ऐसा करने वालों को उपकृत भी किया जाता है. लेकिन जो पत्रकार घोटाले उजागर करने, किसी घटना के मामले में पुलिस की थ्योरी से अलग अपनी पड़ताल पर आधारित खबर लिखने की कोशिश करते हैं, उन्हें ना सिर्फ धमकियां दी जाती हैं बल्कि कई बार प्रताड़ित भी किया जाता है और झूठे केसों में फंसाने की भी कोशिश की जाती है.”