इनकम टैक्स ई-फाइलिंग में देरी: जानें लेट फीस का गणित और देरी से मिलने वाले रिफंड पर ब्याज के नियम

आयकर रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा चूकने पर करदाताओं को भारी ब्याज देना पड़ता है. वहीं, दूसरी ओर देरी से रिफंड जारी करने पर सरकार भी करदाताओं को ब्याज देने के लिए बाध्य है. जानें दोनों पक्षों के सटीक नियम.

Income Tax Refund

आयकर (Income Tax) ई-फाइलिंग का सीजन कई करदाताओं के लिए दो तरह की उलझनों के साथ खत्म होता है. या तो उन्हें रिटर्न फाइल करने में देरी के लिए अतिरिक्त ब्याज देना पड़ता है, या फिर वे अपने रिफंड का लंबे समय तक इंतजार करते हैं. कानून जहां टैक्स भरने में देरी करने वालों पर जुर्माना लगाता है, वहीं सरकार पर भी यह जिम्मेदारी डालता है कि रिफंड में देरी होने पर वह करदाता को इसका हर्जाना दे. वित्तीय नुकसान से बचने के लिए इन दोनों स्थितियों में ब्याज के नियमों को समझना बेहद जरूरी है.

टैक्सपेयर्स पर देरी का आर्थिक बोझ

यदि कोई आयकर रिटर्न (ITR) निर्धारित समय सीमा के बाद दाखिल किया जाता है और उस पर टैक्स बकाया है, तो आयकर अधिनियम की धारा 234A के तहत ब्याज लगना शुरू हो जाता है. बकाया टैक्स राशि पर 1 प्रतिशत प्रति माह या महीने के एक हिस्से की दर से साधारण ब्याज लिया जाता है.

यह ब्याज मूल नियत तिथि (Due Date) से लेकर भुगतान की वास्तविक तिथि तक गिना जाता है. उदाहरण के लिए, यदि समय सीमा September 16 थी और भुगतान December 30 को किया गया, तो करदाता को बकाया राशि पर 4 प्रतिशत ब्याज देना होगा. हालांकि, यदि सारा टैक्स पहले ही जमा किया जा चुका है और देरी सिर्फ कागजी प्रक्रिया में हुई है, तो धारा 234A के तहत कोई ब्याज नहीं लगता.

देरी से मिलने वाले रिफंड पर सरकारी ब्याज

जिस तरह करदाताओं को देरी के लिए भुगतान करना पड़ता है, उसी तरह आयकर विभाग भी अतिरिक्त टैक्स रिफंड करने में देरी होने पर ब्याज देने के लिए उत्तरदायी है. धारा 244A के तहत, विभाग को रिफंड की गई राशि पर 0.5 प्रतिशत प्रति माह की दर से साधारण ब्याज देना होता है.

आमतौर पर यह ब्याज निर्धारण वर्ष (Assessment Year) की April 1 से रिफंड मिलने की तारीख तक जोड़ा जाता है. लेकिन यदि करदाता ने खुद ई-फाइलिंग में देरी की है, तो ब्याज केवल रिटर्न दाखिल करने की तारीख से ही मिलना शुरू होता है. यह नियम करदाताओं के लिए रिफंड की अंतिम राशि पर बड़ा प्रभाव डालता है.

रिफंड रुकने के मुख्य कारण

रिफंड में देरी अक्सर तकनीकी या अनुपालन संबंधी समस्याओं के कारण होती है. इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

रिटर्न में दी गई जानकारी और फॉर्म 26AS या AIS डेटा में अंतर होना.

बैंक खाते का प्री-वैलिडेट (Pre-validated) न होना.

पैन (PAN) का आधार से लिंक न होना.

पुराने टैक्स बकाया का रिफंड के साथ समायोजन.

रिटर्न का स्क्रूटनी (Scrutiny) के लिए चुना जाना.

कब नहीं मिलता रिफंड पर ब्याज?

यदि देरी करदाता की गलती के कारण होती है, जैसे कि रिटर्न में गलत जानकारी देना, टैक्स नोटिस का जवाब न देना या बार-बार समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध करना, तो विभाग ब्याज देने से मना कर सकता है. इसके अलावा, यदि रिफंड की राशि 100 रुपये से कम है, तो कानूनन उस पर कोई ब्याज देय नहीं होता.

विशेषज्ञों का कहना है कि ई-फाइलिंग पोर्टल पर समय-समय पर रिफंड स्टेटस चेक करना और बैंक विवरण अपडेट रखना इस प्रक्रिया को आसान बना सकता है.

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