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'हिजाब और पगड़ी की अनुमति, लेकिन बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पर रोक' भारत में कंपनियों के नियम क्या कहते हैं?

सोशल मीडिया पर कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि कार्यस्थल पर अगर हिजाब की अनुमति है, तो हिंदू धार्मिक प्रतीकों की इजाजत क्यों नहीं होनी चाहिए.

'हिजाब और पगड़ी की अनुमति, लेकिन बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पर रोक' भारत में कंपनियों के नियम क्या कहते हैं?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सोशल मीडिया पर कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि कार्यस्थल पर अगर हिजाब की अनुमति है, तो हिंदू धार्मिक प्रतीकों की इजाजत क्यों नहीं होनी चाहिए. भारत में कंपनियों के नियम और कानून इस बारे में क्या कहते हैं?देश में कार्यस्थल पर धार्मिक प्रतीकों को लेकर बहस छिड़ी हुई है. हाल ही में लेंसकार्ट और एयर इंडिया की हैंडबुक के स्क्रीनशॉट वायरल हुए. दावा किया गया कि एयर इंडिया के केबिन क्रू को ड्यूटी के दौरान बिंदी, सिंदूर, तिलक, चूड़ा और कलावा पहनने की अनुमति नहीं है. सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे हिंदू संस्कृति का अपमान बताना शुरू कर दिया. बाद में दोनों कंपनियों ने स्पष्ट किया कि जिन मैनुअल्स को लेकर विवाद उठ रहा है, वे असल में पुराने हैं.

किस चीज की इजाजत है और किस पर रोक है, यह हर संस्था के अपने नियम और परिस्थितियों पर निर्भर करता है, न कि सीधे किसी के धर्म पर. अक्सर ऐसे प्रतिबंध कार्यस्थल पर समानता और एकरूपता बनाए रखने के उद्देश्य से लगाए जाते हैं. हालांकि अदालतें कुछ प्रतीकों को ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा' मानती हैं. जबकि कई अन्य को वैकल्पिक या सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखती हैं, फिर भले ही आस्था रखने वाले इससे असहमत हों.

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प्रियंका मित्तल गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं. उनकी शादी पिछले साल राजस्थान के भीलवाड़ा के एक परिवार में हुई थी. प्रियंका सिंदूर, चूड़ियां और मंगलसूत्र पहनकर दफ्तर नहीं जातीं. इस पर ससुराल ही नहीं, उनके अपने परिवार को भी आपत्ति है. प्रियंका इसके पीछे अपने कारण बताती हैं. चूड़ियां पहनकर लैपटॉप पर काम करना मुश्किल होता है. गर्मियों में मंगलसूत्र से गर्दन पर रैशेज हो जाते हैं. वह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "मुझे देखकर कोई भी सबसे पहले यही सवाल पूछता है कि मंगलसूत्र कहां है? शादी के बाद मैं अपने घर गई थी. मैं बहुत थकी हुई थी. इसलिए मैंने मंगलसूत्र उतारकर रख दिया. मेरी मां ने तुरंत मुझे वापस पहनने के लिए कहा."

प्रियंका आगे बताती हैं, "मेरी अपनी पसंद मायने ही नहीं रखती. मुझे हर समय मंगलसूत्र, बिछिया और सिंदूर पहनकर ‘शादीशुदा' दिखना है. ससुराल में तो मुझे हर समय घाघरा पहनने और घूंघट करने को कहा जाता है. लोग तो यह तक कहते हैं कि पत्नी बनना एक ‘सौभाग्य' है. ये प्रतीक हमारी पहचान और गर्व हैं.”

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सायली केतकर मुंबई में स्थित एक निजी बैंक में काम करती हैं. उनके पति कहते हैं कि जैसे मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनती हैं, वैसे ही उन्हें सिंदूर और मंगलसूत्र पहनना चाहिए. शादी में मिले गहनों को लेकर भी उन पर दबाव है. सायली ने बताया, "मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं सोने का नथ, मंगलसूत्र और अंगूठी हमेशा पहनकर रखूं. लेकिन इन्हें पहनकर बैंक में काम करना अनकम्फर्टेबल लगता है. वैसे भी नाम से धर्म और उम्र से वैवाहिक स्थिति समझी जा सकती है. इसके लिए प्रदर्शन की जरुरत नहीं."

कई नारीवादी और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों में इन्हें ऐसे प्रतीक माना जाता है जो महिला की पहचान को विवाह से जोड़ते हैं, लेकिन पुरुषों पर समान प्रतीकात्मक दायित्व नहीं डालते. इसी वजह से आधुनिक बहसों में इन्हें धर्म से ज्यादा सामाजिक और पितृसत्तात्मक परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है. लेकिन चूंकि बहुत‑सी महिलाएं अपनी पसंद से बिंदी, सिंदूर या मंगलसूत्र पहनती हैं इसलिए इनके केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि धार्मिक‑सांस्कृतिक मायने भी हैं.

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ऐसा भी नहीं कि ऐसे प्रतीकों को लेकर बहस सिर्फ भारत में ही है. साल 2017 में ‘यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस' ने फैसला सुनाया कि कंपनियां कर्मचारियों के धार्मिक प्रतीकों जैसे हिजाब, पगड़ी, क्रॉस और किप्पा पर रोक लगा सकती हैं, बशर्ते यह नियम 'न्यूट्रल' ड्रेस कोड के तहत सभी पर समान रूप से लागू हो. अदालत ने अपने बयान में कहा, "किसी संस्था का आंतरिक नियम, जो किसी भी राजनीतिक, दार्शनिक या धार्मिक प्रतीक को दिखने से रोकता है, उसे सीधे तौर पर भेदभाव नहीं माना जाएगा.” कई धार्मिक संगठनों ने इस फैसले पर चिंता जताई और कहा कि इससे कर्मचारियों के धार्मिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं.

'आवश्यक धार्मिक प्रथा' का फैसला लेती है अदालत

कार्यस्थल पर ऐसे नियम और शर्तें अक्सर समानता और एकरूपता (यूनिफॉर्मिटी) कायम रखने के लिए बनाए जाते हैं. ताकि किसी के साथ भेदभाव न हो और सभी कर्मचारी एक स्तर पर रहें. भारतीय कानून में 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिस) का सिद्धांत यह तय करने के लिए इस्तेमाल होता है कि किसी धर्म की कौन-सी प्रथाएं वास्तव में उसके लिए अनिवार्य है. यह अधिकार अदालत के पास है. अगर कोई प्रथा महत्त्वपूर्ण मानी जाती है तो उसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलता है. जैसे सिखों के लिए बाल न काटना और पगड़ी रखना उनकी आस्था का अहम हिस्सा माना गया है.

सुप्रीम कोर्ट में वकील शशांक सिंह डीडब्ल्यू से कहते हैं कि कंपनी और कर्मचारी के बीच कॉन्ट्रैक्ट साइन होता है. कर्मचारी कार्यस्थल की नीतियों का पालन करने के लिए सहमति देता है. शशांक अपने अनुभव से बताते हैं, "अदालत में वकील कलावा और तिलक लगाकर आने लगे हैं. यह चलन 2014 के बाद से बढ़ गया है. इसे कुछ लोग अपनी धार्मिक पहचान और बहुसंख्यक उपस्थिति जताने के तरीके के रूप में देखते हैं. इसीलिए कार्यस्थलों पर समानता के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए ऐसे नियम बनाए जाते हैं."

शशांक उदाहरण देकर समझाते हैं, "अदालतों में वकीलों को रंग-बिरंगे कपड़े और टोपी पहनने की अनुमति नहीं होती. इसी तरह सेना और केबिन क्रू में इस तरह के कई नियम होते हैं, क्योंकि उनके काम की प्रकृति ही ऐसी है. हालांकि, कुछ अपवाद भी होते हैं. जैसे सिखों की पगड़ी, हिजाब और पंडित का शिखा रखना. इन्हें धार्मिक प्रथाओं के रूप में अलग तरीके से देखा जाता है."

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कार्यस्थल बनाम व्यक्तिगत पसंद

कानूनी तौर पर इस मुद्दे का सीधा जवाब नहीं है. कंपनियां कुछ धार्मिक प्रतीकों की अनुमति दे सकती हैं, यदि वे यूनिफॉर्म या सुरक्षा में बाधा न डालते हों. सुप्रीम कोर्ट में वकील अभिषेक सिंह बताते हैं कि हर निजी और सरकारी कंपनी को यह अधिकार है कि वह संविधान के दायरे में रहकर ऐसे नियम बना सकते हैं जो भेदभाव, पूर्वाग्रह और मनमानेपन को रोकें. धर्म एक व्यक्तिगत आस्था का विषय है, जिसे किसी नागरिक से छीना नहीं जा सकता. वह कहते हैं, "ये प्रतिबंध तर्कसंगत और उचित होने चाहिए. हर धर्म में आस्था को मानने और निभाने के अपने-अपने तरीके होते हैं. इसे और समझने के लिए साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को जानना होगा."

कर्नाटक के उडुपी के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने से रोक दिया गया. छात्राओं का कहना था कि हिजाब उनकी आस्था और पहचान का हिस्सा है. जबकि कॉलेज प्रशासन ने ड्रेस कोड का हवाला दिया. एक तरफ छात्राएं हिजाब के समर्थन में थीं. तो दूसरी तरफ कुछ छात्र भगवा गमछा पहनकर आने लगे. मामला सांप्रदायिक तनाव में परिवर्तित हो गया. इस बीच कर्नाटक सरकार ने आदेश जारी किया कि जहां यूनिफॉर्म तय है, वहां उसका पालन अनिवार्य होगा.

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिजाब को इस्लाम की 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' नहीं मानते हुए बैन को सही ठहराया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इस पर अलग-अलग पक्ष रखे.

जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और हिजाब बैन को बरकरार रखने की बात कही. धार्मिक पहचान जैसे हिजाब या तिलक को सेक्युलर संस्थानों में लाना जरूरी नहीं है. राज्य ऐसे नियम बना सकता है. जस्टिस हेमंत गुप्ता के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद19 (1)(a)) और निजता का अधिकार (अनुच्छेद 21) एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, इन्हें एक साथ पढ़ा जाना चाहिए. जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि यह मामला धर्म के साथ व्यक्तिगत पसंद (चॉइस) का है. जरूरी नहीं है कि हर बार यह साबित किया जाए कि यह 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' है. किसी लड़की को हिजाब उतारने के लिए कहना उसकी गरिमा और पढ़ाई के अधिकार को प्रभावित कर सकता है. इस मामले में अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया है.

अल्पसंख्यकों का आर्थिक बहिष्कार

2021 में फैब इंडिया का विज्ञापन आया था. इस ऐड में उनके दिवाली पर लॉन्च हुए नए कलेक्शन को उर्दू शब्दों 'जश्न-ए-रिवाज' के साथ प्रमोट किया गया. कुछ लोगों और बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि दिवाली जैसे हिंदू त्योहार के लिए उर्दू नाम देना, संस्कृति के साथ छेड़छाड़ करना है. सोशल मीडिया पर #NoBindiNoBusiness ट्रेंड करने लगा. कुछ यूजर्स का कहना था कि वे ऐसे ब्रांड्स से खरीदारी नहीं करेंगे, जिसमें मॉडल्स बिंदी नहीं पहनतीं.

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पिछले समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन्होंने सामाजिक और साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाने का काम किया है. इस हफ्ते मुंबई में बीजेपी नेता नाजिया इलाही खान लेंसकार्ट के स्टोर पहुंच गई. वहां जाकर हिंदू कर्मचारियों को तिलक लगाने का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. इसी तरह कोविड महामारी के दौरान सोशल मीडिया पर कई फर्जी वीडियो वायरल हुए. मुसलमानों को वायरस फैलाने से जोड़कर दिखाया गया. वहीं उत्तराखंड में सड़क किनारे मुस्लिम रेडीवालों का बहिष्कार करने जैसी अपीलें की गईं.

भारत में 14 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी रहती है. आलोचकों का कहना है कि ऐसे ट्रेंड के जरिए एक नया 'हिंदू उपभोक्ता वर्ग' बनाने की कोशिश होती है. खरीददार को धर्म के आधार पर जोड़ा जाता है. स्नेहा कहती हैं, "लोगों से कहा जाता है कि अगर आप हिंदू हैं, तो मुसलमानों का बहिष्कार करें और उनसे सामान न खरीदें." उनका मानना है कि इससे खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक अवसर प्रभावित हो सकते हैं. शेयर बाजार में सूचीबद्ध 'बीएसई 500' कंपनियों के एक अध्ययन में पाया गया कि भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में मुस्लिमों की हिस्सेदारी वरिष्ठ पदों और निदेशक स्तर पर केवल 2.67 प्रतिशत ही है.

पुणे विश्वविद्यालय में जेंडर, कल्चर एवं डेवलपमेंट स्टडीज विभाग में प्रोफेसर डॉ. स्नेहा गोले बताती हैं, "ऐसे ट्रेंड का इस्तेमाल हिंदू दक्षिणपंथी समूह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए करते हैं. वरना कौन क्या पहनकर बाहर निकलता है, यह भारत में कभी मुद्दा नहीं रहा. लेकिन टोपी, हिजाब और बुर्का जैसे प्रतीकों को लेकर सवाल उठने लगे हैं. कर्नाटक वाले मामले में बोला गया कि जो लड़कियां हिजाब पहनेंगी, वो कक्षा में नहीं बैठ सकतीं. यह सीधे तौर पर शैक्षिक और सार्वजनिक संस्थानों में मुस्लिम महिलाओं की पहुंच से जुड़ा मामला था. जबकि लेंसकार्ट वाले मामले में ऐसा नहीं है कि बिंदी लगाने पर नौकरी से निकाल दिया जाएगा."

(The above story first appeared on LatestLY on Apr 24, 2026 06:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).