जलवायु संकट के खिलाफ भारत की तैयारी में मदद कर रहा है जर्मनी
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दिल्ली में हुई एक अहम बैठक में जर्मनी ने पेश किया 2 करोड़ यूरो का नया प्लान, जो भारत के हिमालय से लेकर द्वीपीय इलाकों तक, हर उस जगह को जलवायु संकट से बचाने की तैयारी पर खर्च होगा, जहां इसका जोखिम सबसे ज्यादा है.इस साल जर्मनी और भारत के बीच राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली में "फ्रॉम रिस्क टू रेसिलियंस: एडवांसिंग अडॉप्टेशन पॉलिसी पाथवेज” नाम से एक खास बातचीत आयोजित की गई. इस कार्यक्रम की शुरुआत भारत और भूटान में जर्मनी के राजदूत डॉ फिलिप आकरमन ने की. उन्होंने कहा, "यह हमारे 75वें राजनयिक संबंधों का वर्ष है. आने वाले महीनों में होने वाले सभी कार्यक्रम इसी साझेदारी के तहत होंगे. भारत और जर्मनी के बीच यह सहयोग अनोखा है. हम सतत विकास, जलवायु परिवर्तन, स्मार्ट सिटी, प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं और हमें इस साझेदारी पर गर्व है.”

कार्यक्रम में जर्मनी के संघीय पर्यावरण मंत्रालय के राज्य सचिव योखन फ्लास्बार्ट ने साफ कहा कि अब दुनिया के पास समय कम है. उन्होंने कहा, "अब हमारे पास यह चुनने का विकल्प नहीं है कि हम मिटिगेशन करें या एडाप्टेशन. जितना कम हम उत्सर्जन घटाएंगे, उतना ही ज्यादा हमें अनुकूलन में निवेश करना पड़ेगा और अंत में इसकी कीमत किसी न किसी को चुकानी होगी या तो आज योजना बनाकर या कल जलवायु आपदा के रूप में.”

उन्होंने आगे कहा, "जर्मनी और भारत के बीच जलवायु सहयोग की मजबूत नींव पहले से है. अब अगला कदम यह है कि हम रणनीतियों को जमीन पर लागू होने वाले व्यावहारिक समाधानों में बदलें.”

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साल 2008 में जब जर्मनी ने इंटरनेशनल क्लाइमेट इनिशिएटिव की शुरुआत की थी, तब इसका उद्देश्य था कि विकासशील देशों के साथ मिलकर जलवायु संरक्षण, जैव-विविधता और अनुकूलन को बढ़ावा देना था. साल 2024 में में कॉप29 के दौरान जर्मनी ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी. जिसमें जर्मन संघीय पर्यावरण मंत्रालय और संघीय विदेश कार्यालय ने संयुक्त रूप से 6 करोड़ यूरो (दोनों मंत्रालयों से 3-3 करोड़ यूरो) अडॉप्टेशन फंड को देने की घोषणा की थी. यह फंड उन देशों की मदद करने के लिए बनाया गया था, जो जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, ताकि वे पहले से तैयारी कर सकें और भविष्य में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

भारत में नई 2 करोड़ यूरो की परियोजना

इंटरनेशनल क्लाइमेट इनिशिएटिव के तहत जर्मनी ने भारत के लिए 2 करोड़ यूरो तक की एक नई परियोजना शुरू की है. यह परियोजना हिमालय, द्वीपीय क्षेत्र, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत और निचले गंगा के मैदान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से कुछ तैयारियां करने पर केंद्रित होगी. इसमें तहत जंगलों की बहाली, जैव-विविधता गलियारे, बाढ़ और कटाव नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और समुदाय आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन करने पर ध्यान दिया जाएगा.

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कार्यक्रम में चर्चा में हिस्सा बनने वाली वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट इंडिया की कार्यकारी निदेशिका उल्का केलकर ने कहा कि अब नीतियों का केवल दस्तावेजों तक रहना काफी नहीं हैं. उन्होंने कहा, "अडॉप्टेशन अपने आप विकास के साथ नहीं हो जाएगा. क्लाइमेट-सेफ विकास के लिए शुरुआत से ही सोच-समझकर निवेश करना जरूरी है, वरना बाद में समाज को बहुत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है.”

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "वैज्ञानिकों ने दशकों पहले जिन खतरों की चेतावनी दी थी, वे आज वास्तविकता बन रहे हैं. इसलिए भारत जैसे देशों के लिए सावधानी आधारित योजना बनाना बेहद जरूरी है, ताकि विकास और जलवायु सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ सकें.”

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क्लाइमेट फाइनेंसिंग बढ़ाता जर्मनी

2024 में जर्मनी ने क्लाइमेट फाइनेंसिंग में 11.8 अरब यूरो का योगदान दिया. इसमें से लगभग आधा हिस्सा अनुकूलन परियोजनाओं पर खर्च किया गया था. यह दिखाता है कि जर्मनी अब केवल उत्सर्जन घटाने पर नहीं, बल्कि जलवायु प्रभावों से निपटने पर भी उतना ही ध्यान दे रहा है.

इस चर्चा का मुख्य बिंदु यह रहा कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि आज की हकीकत है. इससे निपटने के लिए मिटिगेशन और अडॉप्टेशन दोनों साथ-साथ करना जरूरी है. साथ ही, शुरुआती निवेश भविष्य में होने वाले बड़ी क्षति से सुरक्षा दे सकता है.