Bilkis Bano Case: बिलकिस बानो मामले में 11 दोषियों की रिहाई के खिलाफ याचिका पर SC ने गुजरात सरकार को दिया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के सामूहिक दुष्कर्म और कई हत्याओं के दोषी 11 लोगों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को गुजरात सरकार से जवाब मांगा.
नई दिल्ली, 25 अगस्त: सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के सामूहिक दुष्कर्म और कई हत्याओं के दोषी 11 लोगों की रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को गुजरात सरकार से जवाब मांगा. Sonali Phogat Murder: सोनाली फोगाट की हुई थी हत्या! शव पर कई जगह चोट के निशान, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने दोषियों को छूट की अनुमति नहीं दी है, बल्कि सरकार से विचार करने को कहा है.
जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस विक्रम नाथ के साथ प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एन. वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सवाल यह है कि क्या दोषियों को छूट दी जा सकती थी और क्या यह कानून के मापदंडों के भीतर था?
गुजरात सरकार ने स्वतंत्रता दिवस पर दोषियों को रिहा किया था, जिसने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया. न्यायमूर्ति रस्तोगी ने याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से पूछा, "दिन-ब-दिन, उम्रकैद की सजा के दोषियों को छूट दी जाती है. (इस मामले में) अपवाद क्या है?"
दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया और दो हफ्ते बाद अगली सुनवाई की तारीख तय की.
इसने स्पष्ट किया कि उसके मई 2022 के आदेश में केवल यह कहा गया था कि छूट या समय से पहले रिहाई को उस नीति के संदर्भ में माना जाना चाहिए जो उस राज्य में लागू होती है, जहां अपराध किया गया था. पीठ ने कहा, "मैंने कहीं पढ़ा है कि अदालत ने छूट की अनुमति दी है. नहीं., अदालत ने केवल विचार करने के लिए कहा है."
पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील को गुजरात सरकार के साथ याचिका में दोषियों को पक्षकार बनाने को कहा. शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से कहा, "जो कुछ भी किया गया था, मगर आरोपियों को दंडित किया गया है और दोषी ठहराया गया है."
इसने रिट याचिका की स्थिरता के खिलाफ प्रारंभिक आपत्तियों पर पहले दोषियों में से एक को सुनने के लिए एक वकील द्वारा याचिका की अनुमति नहीं दी.
गुजरात सरकार के वकील ने विचारणीयता के आधार पर याचिका का विरोध किया. वकील ने कहा, "रिट बनाए रखने योग्य नहीं है. वे अजनबी हैं." याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे सिब्बल ने पीठ के समक्ष मामले के गंभीर तथ्य बताए.
पीठ माकपा की पूर्व सांसद सुभासिनी अली, पत्रकार रेवती लौल और प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
उम्र कैद की सजा पाने वाले 11 दोषियों को 15 अगस्त को गोधरा उप-जेल से रिहा कर दिया गया था, जब गुजरात सरकार ने अपनी छूट नीति के तहत उनकी रिहाई की अनुमति दी थी. दोषियों ने जेल में 15 साल से अधिक समय पूरा किया था.
जनवरी 2008 में, मुंबई में एक विशेष सीबीआई अदालत ने बिलकिस बानो के परिवार के सात सदस्यों के सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा.
बानो 21 साल की थी और पांच महीने की गर्भवती थी, जब गोधरा ट्रेन में आग लगने के बाद भड़की हिंसा से भागते समय उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था. जनहित याचिका में गुजरात सरकार के सक्षम प्राधिकारी के आदेश का विरोध किया गया है.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि केवल एक राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारी द्वारा केंद्र के परामर्श के बिना छूट का अनुदान दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 435 के जनादेश के संदर्भ में अनुमेय है.
मामले के तथ्यों का हवाला देते हुए, याचिका में कहा गया है कि किसी भी मौजूदा नीति के तहत किसी भी परीक्षण को लागू करने वाला कोई भी सही सोच वाला प्राधिकारी उन लोगों को छूट देने के लिए उपयुक्त नहीं मानेगा, जो भीषण कृत्यों में शामिल पाए गए हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 25, 2022 10:37 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

