Allahabad HC on Honor Killing: ऑनर किलिंग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बेटी-किराएदार की हत्या करने वाले माता-पिता की उम्रकैद बरकरार
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Allahabad HC on Honor Killing: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस दंपति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है, जिन्हें 2014 में अपनी नाबालिग बेटी और एक किराएदार की हत्या का दोषी पाया गया था. न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने निचली अदालत के 2020 के फैसले को सही ठहराते हुए माता-पिता की अपील को खारिज कर दिया. अदालत ने इस घटना को 'ऑनर किलिंग' की श्रेणी में रखा और इसे "पारिवारिक सम्मान बचाने के नाम पर किया गया घृणित कार्य" बताया.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 20 अगस्त 2014 का है. उत्तर प्रदेश में एक 28 वर्षीय शिक्षक प्रदीप कुमार और उनके मकान मालिक की 15 वर्षीय बेटी घर के भीतर मृत पाए गए थे. जांच में सामने आया कि माता-पिता को जब अपनी नाबालिग बेटी के गर्भवती होने का पता चला, तो उन्होंने तैश में आकर इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया.

बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि दोनों ने आत्महत्या की है, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि दोनों की गला घोंटकर हत्या की गई थी.

साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का महत्व

अदालत ने अपने फैसले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 106 का हवाला दिया. खंडपीठ ने कहा कि चूंकि हत्याएं आरोपियों के घर के भीतर हुई थीं, इसलिए यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे स्पष्ट करें कि मौतें कैसे हुईं.

अदालत ने पाया कि घटनाओं की श्रृंखला पूरी तरह से जुड़ी हुई है. हत्या से ठीक पहले आरोपी मुकेश गुप्ता ने प्रदीप के भाई को फोन कर गर्भावस्था के बारे में जानकारी दी थी, जो हत्या के पीछे के ठोस मकसद (Motive) को दर्शाता है.

सामाजिक मानसिकता पर टिप्पणी

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय समाज की गहरी रूढ़ियों पर भी टिप्पणी की. बेंच ने कहा, "हमें इस तथ्य का न्यायिक संज्ञान लेना चाहिए कि प्राचीन काल से लेकर आज तक, एक औसत भारतीय के लिए बेटी का विवाह पूर्व गर्भवती होना किसी बुरे सपने जैसा है. यह माता-पिता की ओर से अक्सर अनियंत्रित और हिंसक प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है."

अदालत ने माना कि अपनी कथित सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए दंपति ने इस "दुष्ट कृत्य" को अंजाम देने का स्पष्ट उद्देश्य रखा था.

कोर्ट का अंतिम फैसला

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत के न्यायाधीश ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/34 (साझा इरादे से हत्या) के तहत दोषी ठहराकर बिल्कुल सही किया था. अदालत ने उम्रकैद की सजा को 'उपयुक्त और न्यायसंगत' बताते हुए अपील खारिज कर दी. इस फैसले के साथ ही अब दोषी दंपति को अपनी शेष सजा जेल में ही काटनी होगी.