Guru Dutt’s 96th Birth Anniversary: गुरु दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक यादें! जानें उनकी मृत्यु का रहस्य!
गुरु दत्त (Photo Credits: File Photo)
Guru Dutt’s 96th Birth Anniversary: जब-जब भारतीय सिनेमा की बात होगी, स्वर्गीय गुरु दत्त की चर्चा के बिना अधूरी ही होगी. उनके जीवन की क्लासिक फिल्मों प्यासा (1957), कागज के फूल (1959), चौदहवीं का चांद (1960), साहिब बीवी और गुलाम (1962), बहुरानी (1963) का आज भी कोई जवाब नहीं है. निर्माता, निर्देशक, लेखक, कोरियोग्राफर और अभिनेता जैसी तमाम विधाओं के साथ-साथ वह संगीत और लाइटिंग इफेक्ट के भी मास्टर थे. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा उनके समकालीन भारतीय सिनेमा के दिग्गज बिमल रॉय, व्ही शांताराम, के आसिफ और कमाल अमरोही आदि भी मानते थे. आज इस बहुमुखी प्रतिभावान फिल्म मेकर की 96वीं वर्षगांठ पर उनके जीवन के कुछ अंतरंग पहलुओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है.
परिवार के प्रति प्रेम
गुरु दत्त का जन्म मंगलोर में हुआ था, मगर बचपन कलकत्ता (अब कोलकाता) में गुजरा. उस समय उनका नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था. बाद में उन्होंने नाम बदलकर गुरु दत्त पादुकोण रख दिया. आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण मैट्रिक पास करने के बाद उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी. पिता के सहयोग से उन्हें एक कंपनी में 30 रूपये मासिक वेतन पर नौकरी मिल गयी. गुरुदत्त परिवार से बहुत प्रेम करते थे. कहते हैं कि उन्हें जब पहली सेलरी मिली तो उन्होंने अपने टीचर को भगवद् गीता, माँ को साड़ी, पिता को शर्ट और बहनों के लिए फ्रॉक खरीदकर लाये थे. यहां तक कि शादी के बाद वे जब भी कोई आर्नामेंट अथवा कपड़े इत्यादि पत्नी के लिए लाते तो बहनों के लिए भी वही चीजें जरूर लेते थे. वे परिवार के बिना खुद को अधूरा पाते थे.
इस तरह जीवन में आईं गीता राय
फिल्म बाजी के सेट पर गुरु दत्त की मुलाकात एक उभरती नायिका गीता घोष राय चौधरी से हुई. बढ़ती मुलाकातों के बीच दोनों करीब आये और शादी करने का फैसला कर लिया. गुरु दत्त को गीता इतना पसंद करती थीं कि वे घर पर झूठ बोल कर गुरुदत्त की बहन लल्ली से मिलने जा रही है. इसके बाद दोनों खंडाला या आस-पास के हिल स्टेशन पहुंच जाते और खूब मस्ती करते थे. गुरु दत्त और गीता के बीच प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान गुरुदत्त की पत्नी लल्ली करती थीं.
देव से दोस्ती
गुरु दत्त ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत पुणे के प्रभात स्टूडियो से की थी. इसी स्टूडियो में उनकी मुलाकात देव आनंद से हुई. दोनों के बीच कुछ ऐसे संयोग हुए, जो जल्दी ही गहरी दोस्ती में तब्दील हो गई. एक दिन एक बीयर पार्टी में दोनों ने ताउम्र दोस्ती निभाने का वादा किया. गुरु दत्त ने कहा कि अगर वह कभी निर्देशक बने तो देव उनकी पहली फिल्म के हीरो होंगे, और देव आनंद ने कहा कि वे जब भी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी शुरु करेंगे, उनकी पहली फिल्म का निर्देशन गुरु दत्त ही करेंगे. साल 1949 में जब देव आनंद ने नवकेतन फिल्म कंपनी शुरु किया तो वादे के मुताबिक पहली फिल्म बाजी के निर्देशन का दायित्व गुरु दत्त को ही सौंपा.
कोरियोग्राफर बनना चाहते थे गुरुदत्त
जितने कुशल लेखक, निर्देशक और अभिनेता थे, उतनी ही गहरी जानकारी उन्हें संगीत और नृत्य की भी थी. गाने के पिक्चराइजेशन में उनकी कमाल की पकड़ होती थी, अपनी फिल्मों में डांस सिक्वेंश को जितनी कुशलता से गुरुदत्त ने हैंडल किया है, वैसा कम ही देखने को मिलता है. शुरु-शुरु में गुरु दत्त कोरियोग्राफर बनना चाहते थे. 15 साल की उम्र में उन्होंने नृत्य निर्देशक उदय शंकर से विधिवत नृत्य सीखा. अपनी फिल्मों में सांग पिक्चराइजेशन और संगीत में खूब दिलचस्पी लेते थे. वे लाइटिंग इफेक्ट के भी मास्टर थे. अकसर अपनी फिल्म की लाइटिंग वही फिक्स करते थे.
महान कलाकार की मौत का अनसुलझा रहस्य!
फिल्म स्क्रीन पर अपनी मल्टी टैलेंट का प्रदर्शन करनेवाले गुरुदत्त की मृत्यु की गुत्थी आज भी अनसुलझी है. कोई इसे आत्महत्या का नाम देता है तो कोई हत्या, कोई ड्रग्स का ओवर डोज तो कोई हार्ट अटैक बताता है. कहते हैं कि मृत्यु से एक दिन पूर्व फिल्म ‘बहारे फिर भी आयेंगी’ के सेट पर एक लीड कलाकार के कारण शूटिंग शेड्यूल रद्द होने से गुरुदत्त नाराज थे. उन दिनों पत्नी गीता दत्त से रिश्ते अच्छे नहीं होने से वे अलग-अलग रहते थे. दादर के करीब पैडर रोड स्थित अपने अपार्टमेंट में देवीदत्त के साथ डिनर किया. इसके बाद देवीदत्त चले गये. गुरुदत्त को अकेलापन महसूस हुआ तो पत्नी को फोन करके बच्चों को भेजने को कहा, रात ज्यादा होने के कारण पत्नी ने मना कर दिया. थोड़ी देर बाद तय शेड्यूल पर लेखक निर्देशक अबरार अल्वी आये. दोनों ने ‘बहारे फिर भी आयेंगी’ के अगले शेड्यूल पर डिस्कशन किया और देर रात तक ड्रिंक करने के बाद अबरार अल्वी चले गये. अगले दिन 10 अक्टूबर को गुरुदत्त बिस्तर पर मृत पाये गये.