क्या सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से ही निर्मल हो जाएगी गंगा
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

गंगा नदी बक्सर जिले के चौसा से बिहार में प्रवेश करती है. यहां से आरा होते हुए पटना तक आते-आते गंगा का पानी इतना प्रदूषित हो जाता है कि वह नहाने के लायक भी नहीं रह जाता है.गंगा को बचाने के लिए नमामि गंगे परियोजना के तहत नदी के किनारे बसे शहरों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए गए हैं. बिहार में भी एसटीपी और सीवरेज नेटवर्क पर तेजी से काम चल रहा है, ताकि गंगा को प्रदूषण से मुक्ति दिलाई जा सके. हालांकि तमाम उपायों के बावजूद पिछले सात सालों से गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है.

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद ने 33 जगहों पर गंगा जल की शुद्धता की जांच की. जांच रिपोर्ट के मुताबिक गंगा का पानी पीना तो दूर, स्नान करने के लायक भी नहीं रह गया है. इस पानी को फिल्टर भी नहीं किया जा सकता है. इससे पर्यावरणको होने वाला नुकसान समझा जा सकता है.

गंगा नदी के पानी में टोटल कोलीफॉर्म (टीसी) तथा फीकल कोलीफॉर्म (एफसी) बैक्टीरिया की संख्या मानक से काफी अधिक है. एफसी का स्तर मनुष्यों और जानवरों के मल-मूत्र से निकलने वाले सूक्ष्म जीवों से होने वाले प्रदूषण को दिखाता है.

उत्तर प्रदेश से बिहार में घुसने के पहले ही गंगा का पानी पहले ही प्रदूषित हो जाता है. इसके बाद प्रवेश द्वार चौसा से भागलपुर तक सीवरेज की गंदगी से पानी में इन जीवाणुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. राज्य में गंगा नदी का कुल प्रवाह 445 किलोमीटर है. भागलपुर के बाद गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश कर जाती है.

पानी की गुणवत्ता में गिरावट

राजधानी पटना के घाटों की स्थिति भी काफी खराब है. बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक पटना के गुलबी घाट के सौ मिलीलीटर (एमएल) पानी में टोटल कोलीफॉर्म जीवाणुओं की संख्या 92,000 पायी गई, जबकि मानक के अनुसार यह संख्या 500 से अधिक नहीं होनी चाहिए. अगर जीवाणुओं की संख्या 500 तक है तो इस पानी में स्नान किया जा सकता है. इतना ही नहीं अगर यह संख्या 5,000 से अधिक है तो उस पानी को फिल्टर भी नहीं किया जा सकता है.

गुलबी घाट जैसा ही हाल लगभग गांधी घाट, दीघा, फतुहा और गायघाट का है. बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष डॉ. डी.के. शुक्ला कहते हैं, ‘‘बिहार में गंगा नदी के पानी में कोलीफॉर्म जीवाणुओं की संख्या काफी अधिक है, इस कारण पानी प्रदूषित है. शेष मानकों पर बिहार में गंगा नदी का पानी ठीक है. चौसा से लेकर भागलपुर तक नियमित तौर पर पानी की गुणवत्ता की जांच की जाती है.''

तत्काल कार्रवाई की जरूरत

हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को सौंपी गई बिहार सरकार की रिपोर्ट भी बता रही है कि गंगा नदी के पानी में फीकल कोलीफॉर्म जीवाणुओं की संख्या इतनी अधिक है कि यह पानी नहाने लायक तक नहीं रह गया है. करीब 68 प्रतिशत से अधिक मल-जल सीधे नदी में गिर रहा है. बिहार में प्रतिदिन 110 करोड़ मिलियन लीटर सीवेज निकलता है जिसमें 345 करोड़ लीटर सीवेज का ही शोधन हो पाता है. राज्य में बनाए गए आठ में से छह एसटीपी मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहे.

एनजीटी ने प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभावी कार्रवाई करने को कहा है. ट्रिब्यूनल ने एनएमसीजी (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा) से नदी में प्रदूषण नियंत्रण के लिए 18 मार्च, 2025 तक एक ठोस कार्ययोजना पेश करने का निर्देश दिया है.

एसटीपी के जरिए इस गंदे पानी को साफ किया जाता है और फिर साफ किए गए पानी को नदी में छोड़ा जाता है या फिर सिंचाई या दूसरे काम के लिए उपयोग किया जाता है. पानी को साफ करने की प्रक्रिया तीन चरण में पूरी की जाती है. इससे नदी को प्रदूषित होने से तो बचाया जा ही सकेगा, वहीं उपचारित जल को नहरों में डाल राज्य के बड़े हिस्से में सिंचाई का काम भी किया जा सकेगा. इससे एक हद तक गाद की समस्या भी दूर होगी और जलीय जीव-जंतु का संरक्षण भी हो सकेगा.

गंगा की सहायक नदियों के किनारे भी एसटीपी

पटना में छह एसटीपी का निर्माण पूरा होनेवाला है. शहर में 1,165 किलोमीटर सीवरेज नेटवर्क तथा 350 एमएलडी क्षमता की 11 परियोजनाओं पर काम चल रहा है. प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए पहली बार अब गंगा की सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों में भी 945 करोड़ की लागत से एसटीपी बनाए जाएंगे.

पर्यावरणविद एके सेन का कहना है, ‘‘एसटीपी की क्षमता और दक्षता में बढ़ोतरी तो होनी ही चाहिए, इसके साथ ही यह भी तय किए जाने की जरूरत है कि मौजूदा संयंत्र पूरी तरह से चालू हों तथा पर्यावरण के मानकों के अनुरूप काम कर रहे हों. इन संयंत्रों की रियल टाइम मानीटरिंग काफी जरूरी है.''

इसके लिए पहले चरण में दस शहरों को चिह्नित किया गया है. इन शहरों में गंदे पानी को एसटीपी तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन का नया नेटवर्क भी तैयार किया जाएगा. इसके लिए दो साल का समय तय किया गया है. डॉ. शुक्ला कहते हैं, ‘‘गंगा किनारे अधिकांश शहरों में एसटीपी शुरू हो जाएंगे तो पानी स्वच्छ हो जाएगा. बोर्ड इस बात को लेकर सजग है कि उद्योग से किसी भी तरह का कचरा गंगा में न जाए, वहीं इस पर भी ध्यान देना होगा कि किसी भी नाले का पानी सीधे नदी में नहीं गिराया जाए.''

कम हुआ नदी के जलग्रहण का दायरा

गंगा के प्रवाह पर नदी के किनारे बसे गांवों और शहरों में बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और पानी की बढ़ती मांग का काफी असर पड़ा है. नदी की दिशा प्रभावित होने के साथ-साथ प्रवाह में कमी आई है और जलग्रहण का दायरा भी घट गया है. बक्सर से कहलगांव (भागलपुर) तक गंगा की धारा बीते एक दशक में सिकुड़ कर एक तिहाई रह गई है. केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की आठ करोड़ और देश की पचास करोड़ की आबादी गंगा से प्रभावित है.

जानकारों का कहना है कि पहले गंगा में सालों भर पानी रहता था, किंतु अब नवंबर से मार्च तक काफी कम पानी रहता है. राजधानी पटना की बात करें तो यहां कहीं-कहीं गंगा चार किलोमीटर तक दूर जा चुकी है.

पर्यावरणविद सेन कहते हैं, ‘‘नदी में किसी भी तरह का निर्माण पानी की धारा को रोकता है. उससे टकरा कर धारा पीछे की ओर लौटती है और उसकी रफ्तार भी कम हो जाती है. इससे नदी की पेटी में सिल्ट जमा होने लगता है और नदी दूर चली जाती है. नदी में टापू बन जाता है.''

पटना में गायघाट से दीदारगंज तक गंगा में बड़े-बड़े टापू बन गए है. जहां खेती की जा रही है. रेत के ये टीले गंगा के किनारे बसे शहरों में वायु प्रदूषण का भी कारण बनते हैं.

नदी के पानी से झुलस जाएंगे पौधे

शहरी नालों से गंदा पानी गिरने के कारण नदी के इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) को भी नुकसान पहुंचा है. नदी की जैव विविधता और पर्यावरणीय स्थिरता के समक्ष खतरा उत्पन्न हो गया है. पटना के दीघा स्थित एसटीपी के एक कर्मचारी के अनुसार शोधन के लिए जो पानी संयंत्र में आता है, उसमें नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक और ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य होती है.

कई रसायनयुक्त इस गंदे पानी का टीडीएस पांच हजार से कम नहीं होता है. कई चरणों में इसका शोधन किया जाता है, तभी सिंचाई के लिए इसका उपयोग हो सकता है. यह पानी अगर सीधे खेतों में चला जाए तो पौधे बुरी तरह झुलस जाएंगे.

एके सेन कहते हैं, ‘‘शहर के नालों से गंगा नदी में गिर रहा पानी नदी के जल में ऑक्सीजन की मात्रा को बुरी तरह प्रभावित करता है. जो अंतत: मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों के लिए जानलेवा बन जाता है.'' यही वजह है कि गंगा नदी में मछलियां कम मिल रही है. पहले इसमें हिलसा व झींगा जैसी मछलियां मिलती थीं, किंतु अब ज्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं.

माइक्रोप्लास्टिक, कपड़ों के रेशे और अन्य अवशेष जलीय जीव-जंतुओं के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं. धार्मिक मान्यताओं के कारण गंगा नदी के किनारे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी धड़ल्ले से की जा रही है. हालांकि, कई शहरों में विद्युत शवदाह गृह हैं, लेकिन ज्यादा लोग वहां नहीं जाते.