नयी दिल्ली, 14 फरवरी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात ने ‘मुफ्त चीजें’ देने के राजनीतिक दलों के वादे के संबंध में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी आर गवई की टिप्पणियों को लेकर शुक्रवार को उन्हें एक खुला पत्र लिखा और कहा कि न्यूनतम मजदूरी और अन्य श्रमिक अधिकारों के कार्यान्वयन नहीं होने के मद्देनजर ये तथाकथित मुफ्त चीजें भी उचित मुआवजा नहीं हैं।
माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य ने पत्र में कहा कि यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है कि लोग काम नहीं करते क्योंकि उन्हें मुफ्त चीजें मिल रही हैं। उन्होंने उनसे टिप्पणियों पर पुनर्विचार का आग्रह भी किया।
करात ने कहा, "मैं आपको यह खुला पत्र एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिख रही हूं जो श्रमिक वर्गों, विशेष रूप से गरीब महिलाओं के बीच सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में विभिन्न क्षमताओं से जुड़ी हुई है। यह पत्र बेघरों के अधिकारों पर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान "मुफ्त की चीजों" के बारे में आपके द्वारा की गई कथित टिप्पणियों के संबंध में है।"
उच्चतम न्यायालय ने चुनावों से पहले ‘मुफ्त चीजें’ देने के राजनीतिक दलों के वादे पर गत बुधवार को कहा था कि राष्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्यधारा में लाने के बजाय ‘क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं बना रहे।”
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि बेहतर होगा कि लोगों को समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाकर राष्ट्रीय विकास में योगदान दिया जाए।
करात ने कहा, "यह पत्र आवश्यक है क्योंकि मीडिया में व्यापक रूप से प्रकाशित ये कथित टिप्पणियां उन लोगों के प्रति सामाजिक राय को पूर्वाग्रह के रूप में बदल सकती हैं जिन्हें आपने 'मुफ़्त उपहार' कहा है।"
उन्होंने कहा कि पत्र के माध्यम से उनकी याचिका भी है कि कुछ टिप्पणियों पर पुनर्विचार किया जाए।
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