देश की खबरें | उप्र सरकार का न्यायालय से अनुरोध: हाथरस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाये

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि हाथरस में दलित युवती से सामूहिक बलात्कार और मौत के मामले की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी जाये क्योंकि ऐसा करने से यह सुनिश्चित हो सकेगा कि निहित स्वार्थों की खातिर इसको लेकर तरह-तरह की फर्जी और झूठी कहानियां प्रचारित नहीं हों।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, छह अक्टूबर उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि हाथरस में दलित युवती से सामूहिक बलात्कार और मौत के मामले की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दी जाये क्योंकि ऐसा करने से यह सुनिश्चित हो सकेगा कि निहित स्वार्थों की खातिर इसको लेकर तरह-तरह की फर्जी और झूठी कहानियां प्रचारित नहीं हों।

न्यायालय में दायर जनहित याचिका के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष एक हलफनामा दायर किया है। इसमें कहा गया है कि महत्वपूर्ण यह है कि इस मामले की किसी स्वतंत्र केन्द्रीय एजेन्सी से जांच करायी जाये।

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हलफनामे में कहा गया है कि राज्य सरकार पहले ही केन्द्र से अनुरोध कर चुकी है कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी जाये क्योंकि इससे कतिपय निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच में डाले जा रहे व्यवधानों से बचा जा सकेगा।

हलफनामे कहा गया है कि सीबीआई की जांच यह भी सुनिश्चित करेगी कि इस मामले में अपने मकसद के लिये लोग फर्जी और झूठी कहानियां नहीं गढ़ सकेंगे।

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हाथरस के एक गांव में 14 सितंबर को अगड़ी जाति के चार लड़कों द्वारा कथित रूप से सामूहिक बलात्कार की शिकार हुयी दलित लड़की बुरी तरह जख्मी हो गयी थी और एक पखवाड़े बाद 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गयी थी।

कथित सामूहिक बलात्कार के अलावा राज्य सरकार ने राज्य में जातीय संघर्ष फैलाने, हिंसा के लिये उकसाने और मीडिया तथा राजनीतिक हितों वाले एक वर्ग की कथित आपराधिक साजिश के बारे में दर्ज प्राथमिकी की भी जांच कराने का अनुरोध किया है।

हलफनामे के अनुसार, ‘‘राज्य सरकार विनम्रता पूर्वक इस न्यायालय से अनुरोध करती है कि वह सीबीआई को 14 सितंबर, 2020 की घटना में पीड़ित से संबंधित प्राथमिकी के साथ ही जातीय टकराव, हिंसा के लिये उकसाने और मीडिया तथा राजनीतिक हितों वाले एक वर्ग द्वारा दुष्प्रचार की कथित आपराधिक साजिश के संबंध में दर्ज प्राथमिकी की भी जांच करने का निर्देश दिया जाये।’’

सरकार ने कहा कि वह स्वयं शीर्ष अदालत से अनुरोध कर रही है कि सत्यमा दुबे की जनहित याचिका लंबित रखी जाये और न्यायालय की निगरानी में समयबद्ध तरीके से इसकी सीबीआई जांच करायी जाये।

राज्य सरकार ने कहा, ‘‘इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित होगी और यह भी सुनिश्चित हो जायेगा कि जांच के दौरान किसी प्रकार की झूठी कहानियां इसमें हस्तक्षेप नहीं करें।’’

हलफनामे में कहा गया है कि हाथरस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर निराधार टिप्पणियों और और तोड़-मरोड़ कर तैयार की गई कहानियों के सहारे सरकार की छवि भूमिल करने के सुनियोजित प्रयास किये जा रहे हैं।

हलफनामे में उदाहरण देते हुये कहा गया है कि पूरी जांच जारी रहने के बावजूद सोशल, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के कुछ वर्गों के साथ ही राजनीतिक दलों के कुछ वर्ग लगातार इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहे हैं और दोषियों को दंडित करने के लिये सच्चाई बाहर लाने नहीं दे रहे हैं।

हलफनामे में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार के विशिष्ट लोगों की छवि खराब करने के प्रयास में राजनीतिक दलों के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से और अनेक फर्जी हैण्डलों के जरिये फर्जी खबरों को ‘कॉपी पेस्ट’ करके दुष्प्रचार करके छद्म लड़ाई लड़ रहे हैं।

हलफनामे के अनुसार इस तरह के दुष्प्रचार से विभिन्न जिलों में भी कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो रही है, जहां प्रतिद्वन्द्वी राजनीतिक दलों की इकाइयां बेबुनियाद आरोपों और गढ़ी हुयी तस्वीरों के सहारे लोगों को सड़कों पर आकर विरोध प्रदर्शन करने के लिये उकसा रही हैं।

हाथरस की घटना की जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो या विशेष जांच दल से कराने और इस प्रकरण को दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित करने का अनुरोध करते हुये सामाजिक कार्यकर्ता सत्यमा दुबे ने 30 सितंबर को यह जनहित याचिका दायर की थी।

उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में 14 सितंबर को चार व्यक्तियों ने इस युवती के साथ कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किया था। बुरी तरह जख्मी हालत में युवती को सोमवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के लिये भेजा गया, जहां 29 सितंबर को उसकी मृत्यु हो गयी। युवती की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट थी, शरीर लकवाग्रस्त था और उसकी जीभ कटी हुयी थी।

इस युवती को पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां से बाद में उसे सफदरजंग अस्पताल भेजा गया था।

राज्य सरकार के हलफनामे में यह भी कहा गया है कि अलीगढ़ के जेएन मेडिकल अस्पताल द्वारा 22 सितंबर को यौन हिंसा की जांच के बारे में दी गयी गयी तदर्थ मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पहली नजर में बलात्कार के संकेत नहीं मिले हैं।

हलफनामे के अनुसार इसके बाद पीड़ित के नमूने आगे परीक्षण के लिये आगरा स्थित फॉरेंसिक साइंस प्रयोगशाला भेजे गये थे और उस अस्पताल ने भी अपनी अंतिम राय दे दी थी, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि बलात्कार का संकेत देने वाले कोई निशान नहीं हैं।

राज्य सरकार ने कहा है कि पीड़ित का अंतिम संस्कार पूरे रीति रिवाज से किया गया था और कानून व्यवस्था की स्थिति को ध्यान में रखते हुये ही अंतिम संस्कार रात में किया गया था।

हलफनामे के अनुसार खुफिया जानकारियों में बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा और विरोध प्रदर्शन की सूचना थी। इसके मद्देनजर जिला प्रशासन ने मृतक का सभी रस्मों के साथ अंतिम संस्कार रात में करने के लिये उसके माता-पिता को समझाने का निर्णय लिया था ताकि सवेरे शव दाह करने की स्थिति में बड़े पैमाने पर संभावित हिंसा को टाला जा सके। पीड़ित का पार्थिव शरीर मृत्यु होने और फिर पोस्टमॉर्टम के बाद करीब 20 घंटे से रखा था।

अनूप

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