बेंगलुरु, 13 नवंबर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की उस याचिका को बुधवार को खारिज कर दिया जिसमें कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम लिमिटेड से जुड़े कथित घोटाले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का अनुरोध किया गया था।
याचिका पर न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने सुनवाई की, जिन्होंने फैसला सुनाया कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 35ए को इस तरह के हस्तांतरण के लिए आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इससे बैंकिंग संस्थानों के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का मामला हो सकता है, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपी अधिनियम) संभावित रूप से कमजोर हो सकता है।
तीस सितंबर को निर्णय के लिए सुरक्षित रखा गया यह मामला दो मुख्य प्रश्नों पर केंद्रित था: क्या याचिका को संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत उच्चतम न्यायालय को भेजा जाना चाहिए और क्या बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 35 ए डीएसपी अधिनियम को लागू किए बिना सीबीआई जांच की मांग को उचित ठहराती है।
कर्नाटक सरकार का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता बी वी आचार्य द्वारा किया गया। उन्होंने याचिका स्वीकार करने के खिलाफ दलील दी और कहा कि राज्य पुलिस के पास मामले की जांच करने का वैधानिक प्राधिकार है और इस प्राधिकार का केंद्र सरकार द्वारा दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए।
आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 131 के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किसी भी विवाद का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, न कि उच्च न्यायालय द्वारा।
उन्होंने कहा कि आरबीआई का ‘मास्टर सर्कुलर’ सीबीआई को मामले दर्ज करने या जांच करने का अधिकार नहीं देता है और बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 35ए इस तरह के प्राधिकार को प्रभावित नहीं करती है।
सरकारी निगम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने राज्य के रुख का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि सीबीआई का अधिकार केवल उन अपराधों की जांच करने तक सीमित है जिन्हें विशेष रूप से अधिसूचित किया गया है और मामले को सीबीआई को सौंपने की बैंक की याचिका निराधार है क्योंकि यह मुद्दा राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है।
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने बैंकिंग प्रणाली की शुचिता की रक्षा के लिए जांच को सीबीआई को सौंपने की आवश्यकता पर दलील दी।
उन्होंने दलील दी कि सीबीआई जांच शामिल करने के लिए धारा 35ए के तहत आरबीआई के निर्देशों की व्यापक रूप से व्याख्या की जानी चाहिए, खासकर संभावित बैंक धोखाधड़ी वाले मामलों में।
वेंकटरमणी ने इस बात पर जोर दिया कि बैंकिंग संस्थान देश की आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं और सीबीआई जैसी विशेष एजेंसियां ऐसे संवेदनशील मामलों से निपटने के लिए बेहतर हैं।
निगम से जुड़ा अवैध धन अंतरण घोटाला तब सामने आया था, जब इसके लेखा अधीक्षक चंद्रशेखरन पी. ने 26 मई को आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने एक नोट छोड़ा था।
घोटाला सामने आने के बाद, कांग्रेस विधायक बी नागेंद्र ने जून में अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। ईडी ने जुलाई में नागेंद्र को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया था। ईडी ने इसके साथ ही जांच के दौरान पांच अन्य प्रमुख आरोपियों को भी गिरफ्तार किया था। नागेंन्द्र को पिछले महीने जमानत पर रिहा किया गया था।
ईडी ने कहा था कि उसकी जांच से पता चला है कि नागेंद्र के प्रभाव में, निगम के खाते को बिना किसी उचित प्राधिकार के एमजी रोड शाखा (बैंक की) में स्थानांतरित कर दिया गया था, जहां 'गंगा कल्याण योजना' के तहत राज्य के खजाने से 43.33 करोड़ रुपये सहित 187 करोड़ रुपये उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना और सरकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए जमा किए गए थे।
एजेंसी ने कहा था कि बाद में इन कोषों को कई फर्जी खातों के माध्यम से निकाल लिया गया और नकदी और सोने-चांदी में बदल दिया गया। ईडी ने कहा है कि उसकी जांच में यह भी पता चला है कि गबन की गई राशि में से 20.19 करोड़ रुपये का इस्तेमाल बेल्लारी निर्वाचन क्षेत्र से 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले एक उम्मीदवार के समर्थन में किया गया था, साथ ही नागेंद्र के निजी खर्चों के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया था।
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