देश की खबरें | वारंट की तामील करते समय आपातकाल का वास्तविक अर्थ समझा : पूर्व पुलिस अधिकारी

नयी दिल्ली, 22 जून दिल्ली पुलिस के एक युवा अधिकारी विजय मलिक 1975 में लगाये गये आपातकाल के दौरान अपने कई अन्य साथियों की तरह इसके वास्तविक प्रभावों से अनजान थे। उन्हें जब वारंट की तामील करने का काम सौंपा गया, तब स्थिति की गंभीरता और लोगों में व्याप्त गहरे भय की भावना का अहसास हुआ।

देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को मुल्क में आपातकाल की घोषणा की। इसके बाद घटनाओं का एक उथल-पुथल भरा दौर शुरू हो गया। आपातकाल 21 मार्च, 1977 को हटा लिया गया था।

जब देश में आपातकाल लगाया गया था, तब मलिक 28 साल के थे। अब उनकी उम्र 78 वर्ष है और आपातकाल लगाए जाने के 50 साल पूरे हो रहे हैं। मलिक ने उस दौर को याद करते हुए कहा, "अनुशासन के मामले में आम जनता के लिए आंशिक रूप से अच्छा था, लेकिन व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिशोध के मामले में इसका घोर दुरुपयोग किया गया।’’

दक्षिण दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में पुलिस चौकी के प्रभारी और उप-निरीक्षक के रूप में उस वक्त तैनात रहे मलिक को समाचार पत्रों के माध्यम से आपातकाल लागू किए जाने के बारे में पता चला था।

उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा, ‘‘हम पुलिस बल में नए थे और हमें यह भी नहीं पता था कि आपातकाल का क्या मतलब होता है। हमने अपने वरिष्ठों से पूछा और तब हमें समझ में आया कि आगे क्या होने वाला है।’’

आपातकाल को "राजनीतिक युद्ध" करार देते हुए, 1968 में पुलिस बल में शामिल हुए मलिक ने कहा कि पुलिस को जनसंघ जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) के तहत जारी वारंट की तामील करने का काम सौंपा गया था।

उन्होंने कहा कि वारंट में उन व्यक्तियों के बारे में विस्तृत जानकारी होती थी, जिन्हें सरकार कैद करना चाहती थी।

उन्होंने ‘पीटीआई-’ से बातचीत में कहा, ‘‘पूरे नाम और पते के साथ हमें वारंट प्राप्त होते थे और फिर उन्हें हिरासत में लेने के लिए छापेमारी की जाती थी। चूंकि, सूचना तेजी से फैलती थी, इसलिए कुछ मामलों में लोग गिरफ्तार किये जाने से पहले ही भाग जाते थे।"

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