नयी दिल्ली, छह मई उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह उत्तराखंड के जंगलों में आग के संबंध में दायर याचिका पर आठ मई को सुनवाई करेगा।
राज्य में पिछले साल एक नवंबर से अब तक ऐसी 910 घटनाएं हुई हैं जिससे करीब 1,145 हेक्टेयर क्षेत्र के जंगलों को नुकसान पहुंचा है।
यह मामला न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया।
इस मामले में पक्षकार बनने के लिए आवेदन दायर करने वाले एक वकील ने पीठ से कहा कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में लगभग 44 प्रतिशत जंगल जल रहा है और सबसे दुखद बात यह है कि इनमें से आग की 90 प्रतिशत घटनाएं मानव निर्मित हैं।
वकील ने कहा, "मैं आपको कुछ बता रहा हूं जो चौंकाने वाला है। जगह-जगह कार्बन उड़ रहा है। सबसे दुखद यह है कि 90 प्रतिशत घटनाएं मानव निर्मित हैं। यहां तक कि आज की रिपोर्ट भी अत्यंत दुखद है... कुमाऊँ का 44 प्रतिशत जंगल जल रहा है।”
पीठ ने पूछा, "आपने कहा कि 44 प्रतिशत जंगल में आग लगी है?" वकील ने ‘हां’ में उत्तर दिया और कहा कि पूरे क्षेत्र में देवदार के पेड़ हैं।
पीठ ने सुनवाई के लिए मामले को आठ मई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत से वर्तमान स्थिति के संबंध में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने की अनुमति मांगी।
शीर्ष अदालत ने 2019 में याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि पर्वतीय राज्यों में जंगलों में आग एक गंभीर समस्या है, खासकर गर्मियों के दौरान। इसका कारण अधिकांश क्षेत्रों में देवदार के पेड़ों की बड़ी उपस्थिति है जो अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं।
न्यायालय अधिवक्ता ऋतुपर्ण उनियाल की याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उत्तराखंड में जंगलों, वन्यजीवों और पक्षियों को जंगल की आग से बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया गया है। इसमें कहा गया है कि आग की समस्या पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है और पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाती है।
याचिका में जंगलों की आग को रोकने के लिए केंद्र, उत्तराखंड सरकार और राज्य के प्रधान मुख्य वनसंरक्षक को आग से पहले इंतजाम करने तथा नीति बनाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है।
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