देश की खबरें | हिमाचल में बहुपति प्रथा के पीछे ज़मीन बचाना और परिवार को जोड़े रखना है मुख्य कारण

(भानु पी लोहुमी)

शिमला, 22 जुलाई हिमाचल प्रदेश में बहुपति प्रथा (एक महिला के कई पति होना) कोई नई बात नहीं है। इस परंपरा से जुड़े कई जानकारों का कहना है कि राज्य के कुछ हिस्सों में यह प्रथा इसलिए चली आ रही है ताकि परिवार एकजुट रहे और ज़मीन का बंटवारा न हो।

यह पुरानी परंपरा एक बार चर्चा में तब आई जब सिरमौर जिले के ट्रांसगिरी क्षेत्र के शिलाई गांव में हाटी जनजाति के दो भाइयों ने हाल ही में एक ही महिला से शादी की।

राजस्व, बागवानी और जनजातीय मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा, ‘‘यह कोई नई परंपरा नहीं है। बहुपति प्रथा प्राचीन जनजातीय परंपरा और संस्कृति का हिस्सा रही है, जिसका उद्देश्य जमीन को बंटने से बचाना है। यह प्रथा किन्नौर और सिरमौर जिले के कुछ हिस्सों में आज भी प्रचलित है।’’

नेगी किन्नौर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक हैं।

सुनीता चौहान नामक महिला ने प्रदीप और कपिल नेगी से शादी की और कहा कि उन्हें इस परंपरा पर गर्व है और उन्होंने यह निर्णय संयुक्त रूप से लिया है।

शिलाई विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योग मंत्री हर्षवर्धन ने कहा, ‘‘यह परंपरा पुरानी है और शिलाई में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां ऐसी शादी नहीं हुई होगी।’’

हिमाचल प्रदेश के राजस्व कानून इस परंपरा को मान्यता देते हैं, जिसे ‘‘जोड़ीदारा’’ कहा जाता है। इस परंपरा को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 494 और 495 के तहत भी मान्यता प्राप्त है।

हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री वाई.एस. परमार ने इस परंपरा पर शोध किया था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘‘हिमालय में बहुपति प्रथा: सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि’’ विषय पर पीएच.डी की थी।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में डॉ. वाई एस परमार पीठ के पूर्व अध्यक्ष ओ पी शर्मा ने ‘पीटीआई-’ को बताया, ‘‘वाई.एस. परमार के शोध के अनुसार, बहुपति प्रथा हिमालय के सभी पांच खंडों कश्मीर से लेकर नेपाल तक प्रचलित थी। इस प्रथा के पीछे मनोवैज्ञानिक, जैविक और आर्थिक कारण थे।’’

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