जरुरी जानकारी | सरकार ने निवेश, पारिस्थिकी तंत्र के उन्नयन के जरिये ‘आत्मनिर्भर कृषि’ की अवधारणा बनायी

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नयी दिल्ली, 27 जून सरकार ने शनिवार को कहा कि किसानों को उद्यमी बनाकर, निवेश के अवसरों को उपलब्ध कराते हुए भारत को दुनिया का प्रमुख खाद्य स्रोत बनाकर ‘आत्मनिर्भर कृषि’ का सपना पूरा किया जा सकता है।

सरकार ने 'आत्मनिर्भर कृषि' की अवधारणाा पर एक दृष्टि-पत्र पेश करते हुए, कहा है कि भारत, कृषि क्षेत्र में एक मजबूत स्थिति में है तथा सरकार ने हाल ही में एक मजबूत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने के लिए तीन नए अध्यादेशों की घोषणा की है।

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कोविड-19 महामारी के संकट की स्थिति में भारतीय किसानों और उद्योग जगत के प्रयासों की क्षमता इस तथ्य से स्पष्ट होती है कि इस वर्ष खरीफ की बुवाई का रकबा अभी तक 316 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो साल भर पहले ककी समान अवधि में 154 लाख हेक्टेयर ही था।

कृषि सचिव संजय अग्रवाल के एक बयान में कहा, ‘‘किसानों को अपनी ऊपज के लिए बेहतर विपणन के रास्ते तक पहुँच उपलब्ध कराना और प्रतिबंधात्मक कानूनों से कृषि क्षेत्र को मुक्त करके एक मजबूत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना सरकार के मुख्य उद्देश्य है।

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उन्होंने कहा कि कई सक्षम योजनाओं के द्वारा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूत किया जा रहा है।

उन्होंने 26 जून को संपन्न दो दिवसीय वेबिनार में कहा कि इन योजनाओं में, फसल कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे के लिए एक लाख करोड़ रुपये का कृषि आधारभूत ढांचा कोष बनाना, 10,000 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के लिए एक योजना का निर्माण, करीब 2.5 करोड़ ऐसे किसानों को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाना जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) नहीं है और ऐसे डिजिटल मंच को विकसित करना जो आनलाईन बाजार के रूप में काम कर सकें तथा बेहतर पद्धति से खेती (स्मार्ट एग्रीकल्चर), जैसी योजनायें शामिल होंगी।

अग्रवाल ने किसानों को उच्च आय और बेहतर जीवन स्तर वाले उद्यमियों में रूपांतरित कर, कृषि में निवेश के मौके बढ़ाकर और भारत को दुनिया के खाद्य केन्द्र के रूप में बदलकर 'आत्मनिर्भर कृषि' की महत्वाकांक्षी दृष्टि को सामने रखा।

उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान है और यह क्षेत्र देश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को आजीविका प्रदान करता है।

भारत, कृषि रसायनों का उत्पादन करने वाला चौथा सबसे बड़ा देश है, दुनिया के पशुधन का 31 प्रतिशत भाग यहां है और सिंचाई के तहत आने वाला सबसे बड़ा भूभाग है। हालांकि, भारत में खाद्य प्रसंस्करण 10 प्रतिशत से कम है और इसे बढ़ाकर 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य है।

मूल्य वर्धित एवं पोषक तत्वों के सम्मिश्रण वाले स्वास्थ्यवर्द्धक एवं प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो की मांग बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वैश्विक जैविक बाजार प्रति वर्ष 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।

पशुपालन सचिव अतुल चतुर्वेदी ने पशु पालन के काम की तुलना किसानों के लिए एटीएम से करते हुए कहा कि खुदरा विक्रेता के लिए दूध से बढ़कर तत्काल खपत वाला कोई अन्य उत्पाद नहीं हो सकता है।

हालांकि, भारत में दूध की प्रति व्यक्ति खपत अभी भी केवल 394 ग्राम प्रति दिन है, जबकि अमेरिका और यूरोप में 500-700 ग्राम प्रति दिन है।

इसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में डेयरी क्षेत्र में बाजार की मांग को बढ़ाकर 29 करोड़ टन करना है, जो मौजूदा समय में 15.8 करोड़ टन है। उन्होंने कहा कि दुग्ध प्रसंस्करण में संगठित क्षेत्र का हिस्सा मौजूदा 30-35 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है।

चतुर्वेदी ने कहा कि सरकार ने खुरपका और मुंह पका रोग (एफएमडी) के लिए एक साल में एक अरब की संख्या में टीके दे रही है जो कि किसी भी अन्य देश की तुलना में एक बड़ा अभियान है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि मवेशी रोग मुक्त हों । इसके अलावा, सरकार ने पशु-आधार के माध्यम से पांच प्रजातियों के पशु टैगिंग का काम किया है। अगले 1.5 वर्ष में लगभग 57 करोड़ जानवरों के पास अपने माता-पिता, नस्ल और उत्पादकता के मानचित्रण के लिए डिजिटल प्लेटफार्मों पर अद्वितीय आईडी उपलब्ध होगी।

उन्होंने कहा कि 2018 में डेयरी इन्फ्रा डेवलपमेंट फंड और इसी महीने घोषित पशुपालन इन्फ्रा डेवलपमेंट फंड जैसे कई प्रोत्साहनों की घोषणा की गई है।

मत्स्यपालन को एक उभरता (सनराइज सेक्टर) हुआ क्षेत्र बताते हुए, मत्स्य सचिव राजीव रंजन ने कहा, ‘‘मत्स्यपालन क्षेत्र की मुख्य पहचान- इसकी उच्च विकास दर, विशाल और विविध संसाधन हैं, उच्च लाभ के साथ कम निवेश, कम गर्भावधि अवधि, मजबूत तकनीकी समर्थन, विशाल उपभोक्ता आधार और निर्यात के भारी अवसर हैं।’’

अगले पांच वर्षों में इस क्षेत्र में सरकार का प्रमुख लक्ष्य वर्ष 2018-19 के 137.58 लाख टन के मुकाबले मछली उत्पादन वर्ष 2024-25 तक 220 लाख टन करना है। वर्ष 2024-25 में, मछली के निर्यात को बढ़ाकर एक लाख करोड़ रुपये का करना और वर्ष 2028 तक दो लाख करोड़ रुपये का निर्यात क्षमता हासिल करना है। इसके अलावा इस क्षेत्र में रोजगार सृजन क्षमता को वर्ष 2018-19 के लगभग 15 लाख से बढ़ाकर वर्ष 2024-25 तक लगभग 55 लाख करना है।

उन्होंने मत्स्यपालन के क्षेत्र में हाल के नीतिगत सुधारों और सरकार की पहलकदमियों के बारे में बताते हुए कहा कि मत्स्यपालन आधारभूत ढांचा विकास कोष और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) जैसी सुविधाओं का विस्तार मछुआरों तक किया गया है।

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