नयी दिल्ली, 18 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बाल विवाह प्रतिषेध के संबंध में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) देशों के अलावा अफ्रीकी राष्ट्रों और यूरोपीय संघ (ईयू) के कानूनी प्रावधानों का भी हवाला दिया।
न्यायालय ने बाल विवाह के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समझौतों का संदर्भ अपने फैसले में दिया, जिसमें देश में बाल विवाह रोकने के लिए केंद्र, राज्यों, जिला प्रशासन, पंचायतों और न्यायपालिका को कई निर्देश दिये गए हैं।
वर्ष 1990 में अपनाये गए बाल अधिकारों और कल्याण पर अफ्रीकी चार्टर पर चर्चा करते हुए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय फ्रेमवर्क पर आधारित है, जिसमें विवाह के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष करने के लिए कानून बनाने की आवश्यकता बताई गई है।
प्रधान न्यायाधीश ने रेखांकित किया कि चार्टर के अनुच्छेद 21 में विशेष रूप से ‘‘हानिकारक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथाओं के विरुद्ध संरक्षण’’ का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य, गरिमा और विकास के लिए हानिकारक प्रथाओं को समाप्त करने के लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाने चाहिए।
फैसले में यूरोपीय संघ के मानवाधिकार से जुड़े समझौते (ईसीएचआर) पर भी विचार किया गया और कहा गया कि यह एक महत्वपूर्ण कानूनी साधन है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘विशेष रूप से, ईसीएचआर का अनुच्छेद 12 विवाह योग्य आयु के पुरुषों और महिलाओं को विवाह करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 8 निजी और पारिवारिक जीवन के सम्मान के अधिकार की रक्षा करता है।’’
इसमें कहा गया है कि ये अनुच्छेद सीधे तौर पर विवाह के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्वायत्तता और निजी तथा पारिवारिक जीवन के प्रति सम्मान के महत्व पर जोर देते हैं।
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