नयी दिल्ली, 13 दिसंबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि किसी व्यक्ति की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह मामले में ‘‘हितधारक गवाह’’ है, बल्कि उसके बयान पर अधिक सावधानी और सतर्कता से विचार किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। हत्या के 2015 के इस मामले में दोषसिद्धि और सजा को मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने बरकरार रखा था।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि सिर्फ इसलिए कि कोई गवाह हितधारक गवाह है, यह ऐसे गवाह की गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। हालांकि, ऐसे गवाह की गवाही पर अधिक सावधानी और सतर्कता से विचार किया जाना चाहिए।’’
न्यायालय ने अपीलार्थी जॉर्ज की ओर से पेश हुए वकील की इन दलीलों पर गौर किया कि उसकी सजा मृतक के पिता की गवाही पर पूरी तरह आधारित थी।
शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा कि जहां तक मामले में अन्य दो सह-आरोपियों का सवाल है, उच्च न्यायालय ने मृतक के पिता के साक्ष्य को ‘‘अविश्वसनीय’’ पाया और उन्हें दोषी करार देना उचित नहीं पाया।
न्यायालय ने कहा, ‘‘हालांकि, अजीब बात यह है कि उच्च न्यायालय ने उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर... अपीलार्थी के संबंध में विश्वास जताया और उसकी दोषसिद्धि की पुष्टि की।’’
पीठ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी गवाह की एकमात्र गवाही के आधार पर दोषसिद्धि हो सकती है।
अपील स्वीकार करते हुए पीठ ने उच्च न्यायालय के नवंबर 2019 के फैसले को रद्द कर दिया और अपीलार्थी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
पीठ ने अपीलार्थी को किसी अन्य मामले में वांछित न होने की स्थिति में रिहा करने का निर्देश दिया।
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