देश की खबरें | तेलंगाना जनजातीय विश्वविद्यालय विधेयक अब पारित हुआ, सरकार ने नौ साल कुछ नहीं किया : कांग्रेस

नयी दिल्ली, 13 दिसंबर कांग्रेस ने तेलंगाना में केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना से संबंधित विधेयक बुधवार को संसद से पारित होने के बाद दावा किया कि सरकार ने नौ वर्षों तक इस दिशा में कुछ नहीं किया।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी दावा किया कि देश के केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भारी कमी है।

संसद ने तेलंगाना में समक्का सरक्का केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना संबंधी विधेयक को मंजूरी प्रदान कर दी।

राज्यसभा ने केंद्रीय विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2023 को विपक्षी सदस्यों की अनुपस्थिति में चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया। केंद्रीय विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2023 को पिछले सप्ताह लोकसभा ने मंजूरी दी थी।

रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘आज, राज्यसभा ने केंद्रीय विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2023 को पारित कर दिया। इसमें तेलंगाना में एक केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रावधान है। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 की अनुसूची 13 के आइटम 3 में तेलंगाना में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना को अनिवार्य किया गया है। लेकिन मोदी सरकार ने नौ साल तक कुछ नहीं किया।’’

उन्होंने कहा कि अचानक एक अक्टूबर, 2023 को तेलंगाना में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा कर दी कि राज्य में ऐसा एक आदिवासी विश्वविद्यालय बनाया जा रहा है।

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘तेलंगाना का केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय 57वां केंद्रीय विश्वविद्यालय होगा। इन विश्वविद्यालयों में से 85 प्रतिशत 2014 से पहले स्थापित हुए। पहला केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 में पारित किया गया था, जिसमें 16 नए विश्वविद्यालय बनाए गए। आज पारित विधेयक के माध्यम से इसमें कुछ साधारण सी चीज़ें जोड़ी गई हैं। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। शिक्षकों के सभी पदों में से लगभग एक-तिहाई पद ख़ाली पड़े हैं। विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदायों से संबंधित छात्रों की ड्रॉप आउट रेट (पढ़ाई बीच में ही छोड़ने की दर) भी असामान्य रूप से अधिक है।’’

रमेश ने कहा, ‘‘कुछ दिन पहले ही सरकार ने लोकसभा में यह स्वीकार किया था कि पिछले पांच वर्षों में इन समुदायों के लगभग 10,000 छात्र केंद्रीय विश्वविद्यालयों से ड्रॉपआउट हुए हैं।’’

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