वाराणसी, 20 मार्च धूल भरी सीढ़ियां, समय के साथ जर्जर हो चुकी दीवारें और उसके ठीक सामने बह रही गंगा नदी, यही वह जगह हैं जहां युवा बिस्मिल्लाह खान घंटों रियाज किया करते थे।
यहां वह सुबह चार बजे से लेकर सूर्योदय होने तक और फिर दोपहर से लेकर सूरज ढलने तक रियाज किया करते थे।
उनकी शहनाई की गूंज नौबतखाने से बहुत पहले ही गायब हो चुकी है, लेकिन उस्ताद, जिन्होंने इसकी मधुर आवाज को विश्व फलक पर पहुंचाया और इसका पर्याय बन गए और आज भी इसके भीतर और बाहर मौजूद हैं।
भारत के महानतम संगीतकारों में शुमार किए जाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शुक्रवार को 109वीं जयंती है। उनकी यादें इस मंदिर नगरी के कोने-कोने में बसी हुई हैं, जहां वह रहे थे, शिक्षा हासिल की और शहनाई को आगे बढ़ाया।
इस शास्त्रीय संगीतकार ने 15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक भाषण से पहले लाल किले की प्राचीर से राग ‘काफ़ी’ बजाकर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा की थी।
‘शहनाई के सुल्तान’ कमरुद्दीन खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। उनके जीवन से जुड़ी कई कहानियां प्राचीन शहर बनारस या वाराणसी के घाटों और संकरी गलियों में सुनाई जाती हैं। शहर के निवासियों के लिए खान विश्व प्रसिद्ध संगीतकार थे, जिनमें से कुछ उन्हें जानते थे और कुछ जो उनके बारे में कहानियां सुनते हुए बड़े हुए हैं।
दिग्गज शहनाई वादक ‘गंगा जमुनी तहजीब’ के प्रतीक भी थे।
बालाजी और मंगला गौरी मंदिरों के चौराहे पर स्थित नौबतखाना शायद बिस्मिल्लाह खान का पहला पड़ाव था। वर्ष 2006 में उनके निधन के लगभग 19 साल बाद, कमरे का फर्श और उस ओर जाने वाला रास्ता जर्जर हो गया है।
मंगला गौरी मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित नारायण गुरु ने ‘पीटीआई-’ को बताया, ‘‘यह वह स्थान है जहां बिस्मिल्लाह खान बैठते थे। उनका रियाज चार चरणों में होता था। वह अंदर एक कोने में दीया जलाते और सुबह चार बजे, दोपहर में, फिर शाम को और बाद में रात में शहनाई का रियाज करने बैठते थे।’’
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