नयी दिल्ली, आठ जनवरी विशेषज्ञों और छात्रों का कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसर कई लोगों के लिए पसंदीदा विकल्प नहीं हो सकते हैं, जो विदेशी डिग्री को दूसरे देश में प्रवास के लिए एक सीढ़ी के रूप में भी देखते हैं।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने पहली बार विदेशी विश्वविद्यालयों को दाखिला प्रक्रिया और शुल्क संरचना तय करने के लिए स्वायत्तता के साथ भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति देने को लेकर मसौदा मानदंड का अनावरण किया है।
कई विषय विशेषज्ञ और विदेश में अध्ययन करने के इच्छुक छात्रों का मानना है कि विदेशी विश्वविद्यालय में अध्ययन करना केवल एक अंतरराष्ट्रीय डिग्री हासिल करने से कहीं अधिक है।
रिपुन दास एमोरी यूनिवर्सिटी के गोइजुएटा बिजनेस स्कूल में प्रबंधन की डिग्री हासिल करने के लिए इस साल अमेरिका जाने वाले हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ज्यादा छात्र इसलिए जाते हैं क्योंकि विदेशों में पढ़ाई करने से उन्हें उन देशों में बसने के लिए नौकरी के अवसर मिलते हैं, इसलिए ऐसे विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसर से उन्हें यहां बनाए रखने में कोई मदद नहीं मिलेगी।’’
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के एससी जॉन स्कूल ऑफ बिजनेस में पीएचडी स्कॉलर शरण बनर्जी का मानना है कि इन विदेशी विश्वविद्यालयों का महत्व अक्सर उस समुदाय में होता है जिसे आप परिसर में पाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें परिसर स्थापित करने की अनुमति देना उसी सफलता की कहानी को दोहराना नहीं हो सकता है। यह विदेशी विश्विविद्यालयों की शोहरत या डिग्री और गहन अध्ययन के मामले में कम आकर्षक हो सकता है।’’
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजेश झा के अनुसार, हर जगह किसी विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर प्रमुख आकर्षण होता है। उन्होंने पीटीआई- से कहा, ‘‘दूसरी बात, समय के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थान स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में मजबूत जड़ों के साथ विकसित होते हैं।’’
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