देश की खबरें | सीताराम येचुरी: कुशल वक्ता एवं उदारवादी वामपंथी राजनीति के पुरोधा

नयी दिल्ली, 12 सितंबर बहुविद्, मिलनसार और कुशल वक्ता मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पांचवें महासचिव सीताराम येचुरी, जो राजनीति के साथ-साथ फिल्मी गीतों पर भी विस्तार से अपनी बात रख सकते थे, एक ऐसे उदार वामपंथी नेता थे जिनके मित्र सभी राजनीतिक दलों में थे।

पार्टी के तीन बार प्रमुख रहे येचुरी का बृहस्पतिवार को यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। उन्होंने उस समय पार्टी की कमान संभाली थी जब वामपंथी दल ढलान पर था। वह 72 वर्ष के थे।

वह अप्रैल, 2015 में विशाखापत्तनम में पार्टी के 21वें अधिवेशन में माकपा के पांचवें महासचिव बने थे और उन्होंने प्रकाश करात सेपदभार संभाला था। करात अपने कट्टर रुख के लिए जाने जाते थे। अपने पूर्ववर्ती करात से बिल्कुल अलग येचुरी गठबंधन राजनीति की चुनौतियों का सामना करने में सफल रहे। वह अपने गुरु पार्टी के दिवंगत नेता हरकिशन सिंह सुरजीत के काफी करीब माने जाते थे।

येचुरी ने सुरजीत के मार्गदर्शन में काम सीखा, जो 1989 में गठित वी.पी. सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार और 1996-97 की संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान गठबंधन युग में एक प्रमुख नेता थे। इन दोनों ही सरकारों को माकपा ने बाहर से समर्थन दिया था। येचुरी 2004 से 2014 तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के शासनकाल में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे और उन्होंने इस सरकार के कार्यकाल के दौरान सक्रिय भूमिका निभाई थी।

चेन्नई में जन्मे और दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने वाले येचुरी, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के कार्यकाल के दौरान संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी के भरोसेमंद सहयोगी थे।

वह पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे, जिन्हें सोनिया गांधी ने 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मुलाकात के बाद फोन किया था, जब उन्होंने प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार कर दिया था और इसके लिए मनमोहन सिंह का समर्थन किया था।

संयुक्त मोर्चा सरकार के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम का मसौदा तैयार करने में येचुरी ने कांग्रेस नेता पी चिदंबरम के साथ काम किया था।

येचुरी ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर संप्रग सरकार के साथ चर्चा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, 2008 में वामपंथी दलों ने इस मुद्दे पर संप्रग-1 सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था, जिसका मुख्य कारण उनके पूर्ववर्ती प्रकाश करात का अडिग रुख था।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने येचुरी के निधन पर दुख जताते हुए कहा, ‘‘सीताराम येचुरी एक बहुत अच्छे इंसान, बहुभाषी, व्यावहारिक प्रवृत्ति वाले धुर मार्क्सवादी, माकपा के एक स्तंभ और विलक्षण बौद्धिक क्षमता एवं हास्यबोध वाले एक शानदार सांसद थे।’’

पुराने हिंदी फिल्मी गानों, किताबों और राजनीति पर विस्तार से अपनी बात रखने के लिए चर्चित येचुरी 2017 तक 12 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे और विपक्ष की एक मजबूत आवाज बने रहे।

वर्ष 2015 में पार्टी महासचिव का पदभार संभालने के बाद ‘पीटीआई-’ को दिए एक साक्षात्कार में येचुरी ने कहा था कि उन्हें महंगाई जैसे मुद्दों पर समर्थन वापस ले लेना चाहिए था, क्योंकि 2009 के आम चुनाव में परमाणु समझौते के मुद्दे पर लोगों को संगठित नहीं किया जा सका।

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