नयी दिल्ली, 28 मार्च उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर कई अपीलों को सोमवार को खारिज करते हुए कहा कि केरल सरकार के पास सिल्वरलाइन परियोजना के संबंध में सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन कराने के लिए सर्वेक्षण कराने और संपत्तियों को उचित रूप से चिह्नित करने का अधिकार है।
न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने अपीलों को खारिज कर दिया और कहा कि उच्च न्यायालय का एकल न्यायाधीश "प्रतिष्ठित परियोजना’’ को रोक नहीं कर सकता है।
पीठ ने कहा, “एकल न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की संपत्तियों के सर्वेक्षण और प्रस्तावित सेमी-हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के संबंध में किसी भी तरह के अधिग्रहण कदम पर रोक लगा दी है। एकल न्यायाधीश को इस बात को समझना चाहिए था कि इस तरह के अंतरिम आदेश से प्रतिष्ठित परियोजना को रोका नहीं जा सकता था। खंडपीठ ने ठीक ही दखल दिया और ऐसे अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया।”
पीठ ने कहा, “यह ध्यान देने की जरूरत है कि उस स्तर पर प्रक्रिया केवल सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन अध्ययनों के संबंध में थी, जिससे याचिकाकर्ताओं को कोई नुकसान नहीं होता। हम खंडपीठ के विचार से पूरी तरह सहमत हैं। इस अदालत के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।”
उच्च न्यायालय ने 14 फरवरी को अपने आदेश में कहा था कि केरल सरकार के पास सिल्वरलाइन परियोजना के संबंध में एसआईए के लिए सर्वेक्षण कराने और संपत्तियों को उचित रूप से चिह्नित करने का अधिकार है।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 20 जनवरी के एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसने एसआईए के लिए संपत्तियों की पहचान के वास्ते एक सर्वेक्षण को सात फरवरी तक के लिए टाल दिया था।
परियोजना के तहत तिरूवनंतपुरम से कासरगोड तक 530 किमी हिस्से में अवसंरचना के-रेल द्वारा विकसित की जाएगी। के-रेल केरल सरकार और रेल मंत्रालय का संयुक्त उपक्रम है जो दक्षिणी राज्य में रेल अवसंरचना का विकास करेगा।
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