जरुरी जानकारी | संविधान की सातवीं अनुसूची पर फिर से विचार करने की जरूरत: एन के सिंह

नयी दिल्ली, 11 दिसंबर वित्त आयोग के चेयरमैन एन के सिंह ने शु्क्रवार को संविधान की सातवीं अनुसूची पर फिर से विचार किये जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और प्रौद्योगिकी में आते बदलाव को देखते हुये उन्होंने यह जरूरत बताई। यह अनुसूची केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों का आवंटित करती है।

15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एन के सिंह का कहना है कि संविधान की 7वीं अनुसूची में तीन सूचियां हैं -- संघ, राज्य और समवर्ती। इसके तहत केन्द्र सरकार को इसकी संघीय सूची के तहत दिये गये विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है तो राज्य सरकारों को राज्य सूची में दिये गये विषयों पर कानून बनाने के अधिकार दिये गये हैं।

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वहीं समवर्ती सूची के तहत आने वाले विषयों पर केन्द्र और राज्य दोनों को कानून बनाने के अधिकार दिये गये हैं लेकिन विवाद की स्थिति में केन्द्र के कानून ही माने जायेंगे।

प्रमुख वाणिज्य एवं उद्योग मंडल फिक्की की 93वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुये सिंह ने कहा, ‘‘ ... हमें संविधान की सातवीं अनुसूची को और बुनियादी ढंग से फिर से देखने की जरूरत है।

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सिंह ने केन्द्र- राज्य संबंधों पर न्यायमूर्ति एमएम पंछी की अध्यक्षता वाले आयोग ने 2010 में यह सिफारिश की थी कि समवर्ती सूची के तहत आने वाले विषयों पर बनने वाले कानूनों पर एक अंतरराज्यी परिषद के जरिये केन्द्र और राज्यों के बीच विचार विमर्श की प्रक्रिया होनी चाहिये।

सिंह ने कहा कि उसके बाद से राजनीतिक स्थिरता, प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय प्राथमिकता वाली उभरती नई चुनौतियों के मामले में कई दूरगामी बदलाव हो चुके हैं, ऐसे में इन सभी पर हमें पूरी गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

उन्होंने आगे कहा कि केन्द्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) को इतना लचीला होना चाहिये कि राज्य इन्हें अपना सकें और इनमें नवप्रवर्तन कर सकें। सिंह ने कहा कि सीएसएस योजनाओं के लिये कुल सार्वजनिक व्यय 6 से 7 लाख करोड़ रुपये सालाना है। इसमें केन्द्र सरकार अकेले 3.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है जो कि जीडीपी का 1.2 प्रतिशत है।

वित्त आयोग के अध्यक्ष ने आगे कहा कि केन्द्र और राज्यों के राजकाषीय सुदृढीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिये और अधिक मेलजोल और सहयोग की आवश्यकता है।

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