देश की खबरें | पीटीआई ‘फैक्ट चैक’: गोवा में समान नागरिक संहिता का अपना संस्करण (स्वरूप) है

पणजी, चार अप्रैल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शपथ लेने के तुरंत बाद कहा था कि उनकी सरकार राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने के लिए एक समिति बनाएगी। इसे देश में ऐसा करने वाली पहली समिति के रूप में पेश किया गया था। वास्तविकता में इसकी अर्थ ध्वनियां कुछ और है जो इतनी स्पष्ट नहीं है।

यूसीसी का एक संस्करण (स्वरूप) गोवा में पहले से ही मौजूद है। हालांकि इसमें कई अपवाद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मूल रूप से ईसाई शिक्षण में स्थापित एक यूरोपीय कानून है। फिर भी, यह गोवा के सभी निवासियों के लिए धर्म, लिंग आदि की चिंता किये बगैर समानता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।

पिछले महीने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में दूसरी बार शपथ लेने वाले धामी ने हालांकि यह भी कहा था, ‘‘शायद यह गोवा में पहले से ही लागू है।’’ विभिन्न मंचों पर कई संगठनों ने उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया कि उत्तराखंड ऐसा करने वाला पहला राज्य होगा।

गोवा के एक वकील एवं कानूनी विशेषज्ञ, राधारो ग्रेसियस ने कहा, “हमारे लिए यह सौभाग्य की बात है कि, हमें विभिन्न धर्मों के कानूनों का कोई अनुभव नहीं है। सभी गोवावासियों के लिए कानून एक समान है।’’

गोवा के पूर्व महाधिवक्ता कार्लोस अल्वारेस फरेरा ने कहा, ‘‘गोवा में समान नागरिक संहिता धर्म, लिंग, जन्म के क्रम आदि के बावजूद सभी पर लागू होती है। इसलिए सभी अधिकार समान रूप से सभी के लिए होते है।’’

गोवा पुर्तगाली नागरिक संहिता 1867 का पालन करता रहा है, जिसे समान नागरिक संहिता भी कहा जाता है। पुर्तगाली शासन से अपनी मुक्ति के बाद, यूसीसी गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम, 1962 की धारा 5(1) के माध्यम से अस्तित्व में है।

विशेषज्ञों ने कहा कि गोवा में एक यूसीसी की निरंतरता हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के साथ-साथ भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 या शरीयत (आवेदन) अधिनियम 1937 को लागू नहीं करने के बराबर है।

फरेरा ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘पुर्तगाल, जिसने हमें 1867 में समान नागरिक संहिता दी थी, ने मौजूदा खामियों के कारण 1966 में इसे अपने देश में संशोधित किया है।’’

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