नयी दिल्ली, चार जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने मथुरा रोड क्रॉसिंग पर अवरोधक हटाने के लिए पुलिस को निर्देश देने के अनुरोध वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा कि शहर में यातायात के नियमन के मुद्दे पर यातायात अधिकारी सबसे बेहतर ‘जज’ हैं।
उच्च न्यायालय ने पिछले कुछ वर्षों में शहर में सड़क यातायात में उल्लेखनीय वृद्धि और अदालत परिसर के सामने और आसपास के मार्ग में 'पार्क' की गई कारों की संख्या पर भी संज्ञान लिया, जिससे यातायात की जाम की समस्या पैदा हुई है।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने सोमवार को पारित आदेश में कहा, ‘‘यातायात नियंत्रण पूरी तरह यातायात पुलिस का अधिकार क्षेत्र है। यह अच्छी तरह से पता है कि अदालतें देश नहीं चलाती हैं और सरकार के सुचारू कामकाज के लिए निर्णय लेना प्रशासन पर निर्भर है।’’
पीठ ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली सरकार और दिल्ली यातायात पुलिस समेत अधिकारियों को उच्चतम न्यायालय के सामने मथुरा रोड क्रॉसिंग पर लगाए गए अवरोधकों को हटाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया।
अदालत ने कहा, ‘‘शहर में यातायात के नियमन के मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए यातायात अधिकारी बेहतर जज हैं। यह अदालत, यातायात की आवाजाही को विनियमित करने के लिए यातायात अधिकारी द्वारा लिए गए फैसले पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए अपीलीय प्राधिकारी के रूप में काम करने को इच्छुक नहीं है।’’
दिल्ली सरकार के स्थायी वकील संतोष कुमार त्रिपाठी और वकील अरुण पंवार ने कहा कि पहली बार, यह मार्ग सिग्नल और भीड़-भाड़ मुक्त हो गया है और यह अब एक स्थायी व्यवस्था है।
याचिकाकर्ता वकील ममता रानी ने कहा कि मथुरा रोड पर सभी चौराहों पर बैरिकेड के कारण उच्चतम न्यायालय की अतिरिक्त इमारत और उच्च न्यायालय की मुख्य इमारत के बीच लगभग 300 से 400 मीटर की दूरी के लिए पांच किलोमीटर से अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, इसमें न केवल समय लगता है बल्कि ईंधन की बर्बादी भी होती है।
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