मुंबई, छह मार्च बंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने कहा है कि लोग आजकल अपनी जाति और समुदाय को लेकर तो संवेदनशील हैं, लेकिन दूसरी जातियों और समुदायों के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाते।
इसी के साथ उच्च न्यायालय ने डॉ. बीआर आंबेडकर के प्रति अनादर दिखाने के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामला खारिज कर दिया, जबकि मामला दर्ज कराने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ पोस्ट करने के लिए फटकार लगाई।
न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति संजय देशमुख की पीठ ने बुधवार को पारित आदेश में कहा कि हर सोशल मीडिया पोस्ट/टिप्पणी या भाषण पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता और ऐसी चीजों के प्रति असहमति या असंतोष जाहिर करने के विवेकशील तरीके भी हैं।
पीठ ने याचिकाकर्ता देवेंद्र पाटिल के खिलाफ अगस्त 2019 में छत्रपति संभाजीनगर जिले के दौलताबाद पुलिस थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत दर्ज प्राथमिकी और उसमें जारी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
प्राथमिकी में दावा किया गया था कि आरोपी ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए शिकायतकर्ता को फोन कर धमकाया था। आरोपी ने शिकायतकर्ता को कथित तौर पर अपशब्द कहे थे और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति अनादर भी दिखाया था।
पीठ ने कहा कि आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच हुई बातचीत डॉ. आंबेडकर के प्रति कोई अनादर नहीं दर्शाती।
उसने कहा कि फोन करने वाले (आरोपी) ने शिकायतकर्ता से पूछा था कि वह डॉ. आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल क्यों कर रहा है, जबकि वह उनके नक्शेकदम पर नहीं चल रहा है।
पीठ ने कहा कि आरोपी ने आगे कहा था कि शिकायतकर्ता जैसे लोगों के कारण ही इन दिनों आंबेडकर के प्रति सम्मान कम हो गया है।
उच्च न्यायालय ने कहा, “इस बातचीत में किसी भी तरह से बाबासाहेब आंबेडकर के प्रति अनादर नहीं दिखता और न ही दो समुदायों के बीच सद्भाव को बिगाड़ने का कोई इरादा जाहिर होता है।”
उसने कहा कि एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आरोपी केवल शिकायतकर्ता की ओर से सोशल मीडिया पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ किए गए उत्तेजक पोस्ट पर प्रतिक्रिया दे रहा था।
अदालत ने कहा, “किसी समुदाय के व्यक्ति को तब आपत्ति करने का अधिकार नहीं हो सकता, जब उसने खुद कोई उकसाने वाला काम किया हो। सभी समुदायों और जातियों में व्यक्तियों के बीच पारस्परिक सम्मान की भावना होनी चाहिए। यही संविधान की आत्मा है।”
उसने कहा, “आजकल हर कोई अपनी जाति और समुदाय को लेकर संवेदनशील है, लेकिन दूसरे समुदाय या जाति के प्रति कोई पारस्परिक सम्मान नहीं दिखाता।”
उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कोई समुदाय या समुदाय/जाति से जुड़े व्यक्ति संयम नहीं दिखाते हैं और सद्भाव लाने के प्रयास नहीं करते हैं, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी। उसने कहा कि हर खराब पोस्ट/टिप्पणी या भाषण पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं है।
अदालत ने कहा, “ऐसे उत्तेजक पोस्ट साझा करने वाले व्यक्ति के प्रति असहमति दिखाने के विवेकशील तरीके और साधन भी मौजूद हैं।”
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