नयी दिल्ली, 19 सितंबर वर्ष 1927 से भारत की गाथा का गवाह रहा भव्य पुराना संसद भवन मंगलवार को दोनों सदनों की कार्यवाही के नए भवन में स्थानांतरित होने के साथ ही इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद की कार्यवाही के नए भवन में स्थानांतरण को नए भविष्य का श्रीगणेश (शुरुआत) बताया।
स्व-शासन की ओर कदम से लेकर भारत की आजादी और देश के परमाणु शक्ति के रूप में उभरने तक, करीब एक सदी लंबी अवधि के दौरान पुराना संसद भवन, जिसे अब संविधान सदन नाम दिया गया है, देश की गाथा का साक्षी रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पुराने संसद भवन का नाम संविधान सदन रखने का सुझाव दिया जिसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वीकार कर लिया और इस फैसले की आधिकारिक घोषणा की।
पुराने संसद भवन में संविधान तैयार किए जाने के दौरान जहां जीवंत बहस हुई, वहीं महात्मा गांधी की मृत्यु की घोषणा के बाद सदन में मार्मिक दृश्य पैदा हो गया था। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश में पाकिस्तानी सैनिकों के बिना शर्त आत्मसमर्पण की घोषणा की, तो सदस्यों ने मेजें थपथपाकर इसका जोरदार स्वागत किया था।
पुराने संसद भवन में पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लोगों के दिलों को छू जाने वाले भाषणों की गूंज सुनाई दी, वहीं लाल बहादुर शास्त्री का शांत लेकिन दृढ़ संकल्प, इंदिरा गांधी की वाकपटुता, अटल बिहारी वाजपेयी की काव्यात्मकता और नरेन्द्र मोदी का प्रभावशाली भाषण भी देखा गया।
ड्यूक ऑफ कनॉट प्रिंस ऑर्थर ने 1921 में पुराने संसद भवन का शिलान्यास किया था और इसका 18 जनवरी 1927 को उद्घाटन किया गया।
वायसराय लॉर्ड इरविन ने 24 जनवरी, 1927 को तीसरी ‘लेजिस्लेटिव असेंबली’ के पहले सत्र को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘आज, आप पहली बार अपने नए और स्थायी सदन में मिल रहे हैं।’’
पंडित मदनमोहन मालवीय, मुहम्मद अली जिन्ना, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, सी एस रंगा अय्यर, माधो श्रीहरि अणे और विट्ठलभाई पटेल उन लोगों में शामिल थे जो ‘लेजिस्लेटिव असेंबली’ के सदस्य थे।
भारत शासन अधिनियम, 1919 के जरिए, अंग्रेजों ने सरकार में भारतीय नागरिकों की अधिक भागीदारी की शुरुआत की थी।
दो साल बाद, क्रांतिकारियों-भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से सदन में बम फेंके थे। उस समय सदन ने विवादास्पद व्यापार विवाद विधेयक को मंजूरी दी थी।
आठ अप्रैल, 1929 को सदन की कार्यवाही की आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘इसी समय दर्शक दीर्घा से दो बम फेंके गए...जिससे कुछ सदस्य घायल हो गए। सदन में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई और अध्यक्ष सदन से बाहर चले गए। कुछ मिनट बाद, अध्यक्ष वापस आए।’’
उस समय विट्ठलभाई पटेल अध्यक्ष थे।
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर, रात 11 बजे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा की बैठक हुई। उत्तर प्रदेश से सदस्य सुचेता कृपलानी ने विशेष सत्र के उद्घाटन के अवसर पर वंदे मातरम गाया।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण "नियति से साक्षात्कार’’ भाषण दिया। इसके बाद संविधान सभा के सदस्यों ने देशसेवा के लिए खुद को समर्पित करने का संकल्प लिया।
अध्यक्ष जी वी मावलंकर ने दो फरवरी, 1948 को लोकसभा की बैठक में महात्मा गांधी की मृत्यु की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था, "हम आज दोहरी आपदा के साये में मिल रहे हैं, हमारे दौर की सबसे महान हस्ती की दुखद मौत, जिन्होंने हमें गुलामी से आजादी की ओर अग्रसर किया...।’’
नेहरू ने कहा था, "हमारे जीवन को रोशन करने वाला सूरज डूब गया है और अब हम ठंड एवं अंधेरे में कांप रहे हैं।"
संसद में ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश से हर हफ्ते एक समय का भोजन छोड़ने की अपील की थी क्योंकि भारत खाद्यान्न की कमी का सामना कर रहा था और 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा था।
वर्ष 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद जब लोकसभा की बैठक हुई थी, तो सदन में मुद्दे उठाने के सदस्यों के अधिकारों को निलंबित करने के सरकार के कदम के खिलाफ कई सदस्यों ने विरोध किया था। विरोध जताने वाले सदस्यों में सोमनाथ चटर्जी, इंद्रजीत गुप्ता, जगन्नाथ राव जोशी, एच एन मुखर्जी, पी के देव शामिल थे।
वर्ष 1989 में देश में गठबंधन का दौर शुरू होने पर 1998 तक सरकारें बदलती रहीं। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन बनाया। लेकिन करीब एक साल बाद ही 17 अप्रैल, 1999 को लोकसभा में उनकी सरकार एक वोट से विश्वास मत हार गई। इसके बाद हुए आम चुनाव में वह फिर निर्वाचित हुए।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 22 जुलाई 1974 को संसद में एक विस्तृत बयान दिया था जिसमें उन्होंने सदन को पोखरण में शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण और उस पर अन्य देशों की प्रतिक्रिया से अवगत कराया।
लगभग 24 साल बाद 1998 में, वैज्ञानिकों ने 11 मई और 13 मई को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया।
उन्होंने कहा था, "भारत अब परमाणु हथियार संपन्न देश है। यह वास्तविकता है जिसे नकारा नहीं जा सकता। यह कोई उपहार नहीं है जिसे हम चाहते हैं; न ही यह दूसरों को दिया जाने वाला कोई दर्जा है। यह हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा देश को दिया गया तोहफा है। यह भारत का हक है।’’
वर्ष 2008 में, अमेरिका के साथ परमाणु करार मुद्दे पर मतभेदों को लेकर वाम दलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्वास मत के दौरान अपनी गठबंधन सरकार का जोरदार बचाव किया था।
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