जरुरी जानकारी | विदेशी बाजारों में मजबूती के बीच तेल-तिलहन कीमतों में सुधार का रुख

नयी दिल्ली, 24 जुलाई विदेशों में सुधार के रुख के बीच दिल्ली बाजार में सोमवार को लगभग सभी तेल-तिलहन के भाव में मजबूती रही और सिर्फ सरसों तेल कीमतें पूर्वस्तर पर टिकी रहीं।

शिकॉगो और मलेशिया एक्सचेंज में मजबूती के रुख के बीच अधिकांश तेल-तिलहन में भी मजबूती देखने को मिली।

बाजार के जानकार सूत्रों ने कहा कि किसानों द्वारा नीचे भाव में बिक्री नहीं करने से सरसों तिलहन कीमतों में सुधार है। चूंकि सरसों अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से खुले बाजार में नीचे भाव में बिक रही है इसलिए किसान रोक-रोक के माल ला रहे हैं जो सरसों तिलहन में सुधार का मुख्य कारण है।

उन्होंने कहा कि एक साल पहले मई में मूंगफली का तेल सूरजमुखी से 25 रुपये किलो नीचे था लेकिन आज मूंगफली तेल आयातित सूरजमुखी तेल से 80 रुपये किलो ऊंचा है क्योंकि माल की उपलब्धता बहुत कम है। माल की कमी इसलिए है क्योंकि इसका उत्पादन नहीं बढ़ा। उत्पादन नहीं बढ़ने का कारण किसानों को अपनी तिलहन उपज के उचित दाम नहीं मिलना है, जो आयातित सस्ते खाद्य तेलों की वजह से लगभग असंभव हो गया है। किसानों को यदि सही दाम मिलते रहें तो वे उन तिलहनों का उत्पादन बढ़ायेंगे और विदेशों पर निर्भरता काफी हद तक खत्म हो सकती है।

मूंगफली तेल की ज्यादातर गुजरात और महाराष्ट्र में खपत होती है और उत्तर भारत में इसका उपभोग बहुत मामूली है।

सूत्रों ने कहा कि विदेशी बाजारों में तेजी के कारण सोयाबीन तेल-तिलहन कीमतों में मजबूती आई। मलेशिया एक्सचेंज में तेजी की वजह से कच्चा पामतेल (सीपीओ) और पामोलीन तेल कीमतों में भी मजबूती आई। उपलब्धता कम होने और मूंगफली का भाव ऊंचा होने से बिनौला तेल कीमतों में भी सुधार आया।

सूत्रों ने कहा कि तेल-तिलहन मामले में आयात पर निर्भरता प्रतिकूल साबित हो सकती है। इसके बजाय देशी तेल-तिलहन उत्पादन बढ़ाने और इनका बाजार विकसित करने के लिए देश में एक खाद्य तेल नीति बनानी चाहिये।

सूत्रों ने कहा कि सरकार को इस बात की ओर गंभीरता से विचार करना होगा कि क्यों तमाम कोशिशों के बावजूद लगभग पिछले 25 साल से देश का तिलहन उत्पादन नहीं बढ़ पाया ? उसे इस ओर भी ध्यान देना चाहिये कि पिछले 10-15 साल में आबादी बढ़ने के साथ साथ दूध, खल, डीआयल्ड केक (डीओसी) और खाद्य तेलों की मांग बढ़ी है और इसके मुकाबले उत्पादन क्यों ठहराव झेल रहा है? वायदा कारोबार वाकई किसानों को कितना प्रोत्साहन देने में सक्षम रहा है या सिर्फ सट्टेबाजों की पनाहगाह बन गया है? जब एनसीडीईएक्स में खल के अगस्त अनुबंध का दाम नीचे चल रहे हैं तो दूध के दाम कम क्यों नहीं हो रहे? पहले देश कपास और रुई का निर्यात करता था और अब क्यों कपड़ा संघ कपास के आयात के लिए आयात शुल्क घटाने की मांग कर रहे हैं? जिस दूध का दाम खाद्य तेल से काफी नीचे रहा करता था आज क्यों दूध के दाम खाद्य तेलों के दाम के आसपास मंडराने लगे हैं? क्या ये सारे सवाल देशी तेल तिलहन उत्पादन बढ़ाने की मांग नहीं करते?

सोमवार को तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:

सरसों तिलहन - 5,550-5,600 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली - 7,625-7,675 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) - 18,500 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली रिफाइंड तेल 2,680-2,960 रुपये प्रति टिन।

सरसों तेल दादरी- 10,800 रुपये प्रति क्विंटल।

सरसों पक्की घानी- 1,785 -1,865 रुपये प्रति टिन।

सरसों कच्ची घानी- 1,785 -1,895 रुपये प्रति टिन।

तिल तेल मिल डिलिवरी - 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 10,550 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 10,400 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 9,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सीपीओ एक्स-कांडला- 8,600 रुपये प्रति क्विंटल।

बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 9,500 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 9,850 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन एक्स- कांडला- 8,900 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।

सोयाबीन दाना - 5,050-5,145 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन लूज- 4,815-4,910 रुपये प्रति क्विंटल।

मक्का खल (सरिस्का)- 4,015 रुपये प्रति क्विंटल।

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