नयी दिल्ली, छह सितंबर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली मणिपुर सरकार ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि राज्य में भोजन और दवाओं की कोई कमी नहीं है।
मणिपुर मेइती और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष के कारण भारी संकट से जूझ रहा है।
मणिपुर सरकार ने जातीय हिंसा के पीड़ितों को राहत और पुनर्वास की निगरानी के लिए शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त समिति के वकील के इस दावे को झूठा करार दिया कि राज्य के लोग आर्थिक नाकेबंदी के कारण परेशान हैं।
उच्चतम न्यायालय ने हिंसा के पीड़ितों के राहत और पुनर्वास की निगरानी के लिए जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गीता मित्तल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।
मणिपुर सरकार ने ये दावे उच्चतम न्यायालय के एक सितंबर के उस आदेश के जवाब में किये, जिसमें उससे और केंद्र से हिंसाग्रस्त राज्य के कुछ क्षेत्रों में आर्थिक नाकेबंदी का सामना कर रहे लोगों को भोजन और दवा जैसी आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कहा गया था।
उच्चतम न्यायालय ने मणिपुर सरकार को राज्य में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित करने वाली नाकेबंदी से निपटने के लिए सभी विकल्प तलाशने का भी निर्देश दिया था। इसमें कहा गया था कि जरूरत पड़ने पर आवश्यक वस्तुओं को हेलीकॉप्टर से गिराने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए।
जातीय संघर्ष के बीच ‘ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन’ ने राज्य में तीन प्रमुख राजमार्गों की नाकेबंदी का आह्वान किया था। हिंसा में 160 से अधिक लोग मारे गये थे और कई लोग घायल हो गये थे।
उच्चतम न्यायालय में दायर एक हलफनामे में, मणिपुर सरकार के मुख्य सचिव ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उच्चतम न्यायालय के मंच का ‘‘दुरुपयोग’’ किया जा रहा है।
इसमें कहा गया है कि सुनवाई के दौरान समिति के वकील और अन्य आवेदकों/याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए दावे बिना किसी तथ्यात्मक आधार के थे।
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक सितंबर को शीर्ष अदालत के सुझाव से पहले ही आवश्यक वस्तुएं हेलीकॉप्टर से गिरा दी गई थी।
जातीय हिंसा के दौरान धार्मिक स्थलों को हुए नुकसान के बारे में राज्य सरकार ने दावा किया कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष गलत स्थिति पेश करने का प्रयास किया है जहां एक समुदाय को पीड़ित और दूसरे को हमलावर के रूप में दिखाया गया है।
हलफनामे में कहा गया है, ‘‘भारत सरकार और राज्य ने हमेशा इस मुद्दे पर तटस्थ रुख बनाए रखा है और विशेष रूप से कुछ घटनाओं को दूसरों की तुलना में चुनिंदा रूप से उजागर करने की कोशिश नहीं की है।’’
मणिपुर सरकार ने अपने 15 पृष्ठ के हलफनामे में शीर्ष अदालत को बताया कि आज तक दोनों समुदायों बहुसंख्यक मेइती और आदिवासी कुकी के 386 धार्मिक संस्थानों को नुकसान हुआ है।
राज्य सरकार ने हलफनामे में कहा कि उसे कुछ वकीलों द्वारा राज्य के कुछ हिस्सों में भोजन की कमी और खसरा और चिकनपॉक्स के फैलने के बारे में सूचित किया गया था।
इसमें कहा गया है, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त दावे बिना किसी तथ्यात्मक सत्यापन के और संबंधित सरकारी अधिकारियों के परामर्श के बिना किये गये हैं, जिससे घबराहट पैदा हुई है।’’
हलफनामे में कहा गया है, ‘‘खसरा/चिकनपॉक्स फैलने की कथित रिपोर्ट रिकॉर्ड से बाहर नहीं है। मोरेह में चिकित्सा टीम द्वारा इसकी पुष्टि की गई है कि मोरेह में चिकनपॉक्स का केवल एक मामला है, और उक्त मरीज राहत शिविर का निवासी नहीं है।’’
इसमें कहा गया है कि सुनवाई के दौरान किए गए दावे बिल्कुल झूठे थे और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समिति के वकील ने संबंधित सरकारी अधिकारियों के साथ मुद्दे की पुष्टि या चर्चा किये बिना उच्चतम न्यायालय के समक्ष उन दावों को सामने रखा।
राज्य सरकार ने कहा कि राहत शिविरों में आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जिला प्रशासन के साथ दैनिक समीक्षा की जा रही है।
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