देश की खबरें | एनजीटी ने एम्स और उसके आसपास वायु प्रदूषण का स्तर घटाने के उपाय लागू करने का आदेश दिया

नयी दिल्ली, चार जुलाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में और उसके आसपास वायु प्रदूषण के स्तर में समयबद्ध तरीके से कमी लाने के लिए दिए गए सुझावों के कार्यान्वयन की निगरानी के वास्ते एक समिति का गठन किया है।

एनजीटी ने एम्स परिसर के अंदर वायु प्रदूषण का स्तर घटाने के उपाय लागू करने की जिम्मेदारी संस्थान के निदेशक को सौंपी है। उसने राष्ट्रीय राजधानी के कई अन्य सरकारी अस्पतालों में समान मुद्दों का अध्ययन करने और उचित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने के लिए एक अलग समिति भी गठित की है।

एनजीटी ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह कदम उठाया, जिसमें दावा किया गया था कि एम्स दिल्ली सहित प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में और उनके आसपास वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में संबंधित अधिकारियों की विफलता से मरीजों, उनके तीमारदारों, डॉक्टरों तथा कर्मचारियों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच रहा है।

एनजीटी ने स्थिति का समाधान तलाशने के लिए सुझाव देने के वास्ते इस साल मार्च में सात सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन किया था, जिसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), पुलिस उपायुक्त (यातायात), क्षेत्रीय प्रभागीय या जिला वन अधिकारी (डीएफओ), दिल्ली नगर निगम (एमसीडी), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी), एम्स निदेशक या उनके नामित व्यक्ति और वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज तथा सफदरजंग अस्पताल के एक नामित व्यक्ति को शामिल किया गया था।

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए के गोयल की पीठ ने संयुक्त समिति द्वारा एक जुलाई को दायर रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी। पीठ ने कहा था कि समिति द्वारा सुझाए गए उपायों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए।

इस पीठ में न्यायकि सदस्य न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल भी शामिल थे। पीठ ने कहा, “हम इस बात से भी सहमत हैं कि एक अस्पताल परिसर पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है, इसलिए न केवल परिसर को, बल्कि आसपास की परिधि के लिए भी एक पर्यावरण प्रबंधन योजना की आवश्यकता होती है। इस तरह की योजना में प्रतिबंधित और नियंत्रित गतिविधियों की पहचान एवं जिक्र किया जाना चाहिए।”

एम्स परिसर के बाहर अपनाए जाने वाले उपायों की निगरानी के लिए पीठ ने आठ सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन किया। इन उपायों में यातायात नियंत्रित करना, अतिक्रमण हटाना, गेट पर भीड़भाड़ एवं वाहनों को तेज गति से चलने से रोकना, सड़क की स्थिति में सुधार लाना और धूल तथा प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर लगाम आदि शामिल है।

पीठ ने कहा कि नयी दिल्ली नगरपालिक परिषद (एनडीएमसी), लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), दिल्ली पुलिस, शहर यातायात पुलिस, एम्स, सीपीसीबी और डीपीसीसी के प्रतिनिधियों से लैस इस समिति को सात सदस्यीय संयुक्त समिति द्वारा दिए गए सुझावों और समयबद्ध तरीके से उनके कार्यान्वयन की निगरानी के संबंध में एक कार्य योजना तैयार करनी है।

पीठ ने कहा, “परिसर में और उसके आसपास परिवेशी वायु गुणवत्ता की निगरानी की जाए और एम्स की सीमा के 500 मीटर के भीतर यह जब भी निर्धारित मापदंडों से अधिक हो, तो ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) के आलोक में नियामक उपाय किए जाएं। ऐसी कार्ययोजना 31 जुलाई तक तैयार कर ली जानी चाहिए।”

जीआरएपी स्थिति की गंभीरता के अनुसार दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए अपनाए जाने वाले उपायों का एक सेट है।

पीठ ने कहा कि पुलिस आयुक्त और एम्स निदेशक समन्वय और अनुपालन के लिए संयुक्त रूप से नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेंगे तथा इस बाबत पहली बैठक 15 जुलाई तक आयोजित की जाएगी।

उसने कहा कि योजना के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए पहली बैठक 31 अगस्त तक आयोजित की जाएगी।

पीठ ने एम्स परिसर के अंदर लागू किए जाने वाले आवश्यक उपायों पर भी गौर किया, जिसमें पौधारोपण, अपशिष्ट प्रबंधन, आगंतुकों और तीमारदारों की आवाजाही का नियमन, बैठने की जगह, वाहनों की प्रकृति, रोगी सेवाओं का प्रबंधन, पार्किंग मुद्दे, शटल सेवा प्रदान करना, स्वैच्छिक संगठनों या व्यक्तियों की भागीदारी और पर्यावरण प्रबंधन या कार्य योजना तैयार करना शामिल है।

उसने कहा कि एम्स निदेशक संबंधित विभागों के समन्वय से इन उपायों को अपनाने के लिए जिम्मेदार होंगे।

पीठ ने कहा, “एम्स निदेशक उपलब्धता की सूरत में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) सहित उपयुक्त सुरक्षा बल की तैनाती का पता लगाने के लिए स्वतंत्र होंगे। एम्स निदेशक इस उद्देश्य के लिए जल्द से जल्द, संभवत: 15 जुलाई से पहले पहली बैठक आयोजित कर सकते हैं और कार्य योजना को अंतिम रूप दे सकते हैं और इसे 31 अगस्त तक एम्स की वेबसाइट पर डाल सकते हैं।”

अधिकरण ने कहा कि एम्स के ठीक सामने स्थित सफदरजंग अस्पताल सहित कई अन्य सरकारी अस्पतालों में भी समान मुद्दे हैं और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अध्ययन एवं उचित विचार-विमर्श के बाद इनके संबंध में उपयुक्त मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने किए जाने की आवश्यकता है।

एनजीटी ने कहा, “तदनुसार, हम केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन करते हैं, जिसमें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय और गृह मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल होंगे, जो संयुक्त सचिव और सीपीसीबी द्वारा नामांकित निदेशक पद से नीचे के नहीं होंगे।’’

अधिकरण ने कहा कि समिति हितधारकों के साथ बातचीत कर सकती है और सभी सरकारी जिला अस्पतालों या मेडिकल कॉलेज सहित बड़े जिला अस्पतालों में और उसके आसपास प्रदूषण के सभी स्रोतों के नियंत्रण के लिए पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं की उपलब्धता की स्थिति पर आंकड़े प्राप्त कर सकती है।

एनजीटी ने कहा कि समिति को एक महीने के भीतर बैठक करनी होगी और उसके बाद एक महीने के अंदर विशिष्ट जानकारी प्राप्त करने के लिए एक प्रश्नावली को अंतिम रूप देना होगा।

उसने कहा, “एकत्रित आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए, उचित एसओपी को तीन महीने के भीतर अंतिम रूप दिया जा सकता है और स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला जा सकता है।”

एनजीटी ने कहा कि समिति को चार महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

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