नयी दिल्ली, 19 अगस्त राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) को औद्योगिक अवशिष्टों को कचरे या उप-उत्पाद के रूप में पहचान के लिए ‘‘स्पष्टीकरण और तत्काल उपाय करने’’ का निर्देश दिया है।
अधिकरण ‘‘औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न सामग्रियों को अवशिष्ट या उप-उत्पाद के रूप में पहचान’’ को लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी रूपरेखा का कार्यान्वयन न होने से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रहा था।
एनजीटी के आदेश के बाद सितंबर 2019 में रूपरेखा जारी की गई थी।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी खतरनाक कचरे को उप-उत्पाद के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाए और खतरनाक एवं अन्य अपशिष्ट प्रबंधन (एचओडब्ल्यूएम) नियम, 2016 की सख्त जांच से बचा जा सके।
याचिका के अनुसार, किसी भी उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न सामग्री को कब ‘‘उप-उत्पाद’’ और कब ‘‘अवशिष्ट’’ माना जाना चाहिए, इसकी रूपरेखा स्थापित नहीं की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस प्रकार, इसे जारी करने का उद्देश्य विफल हो गया है।
कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस.के. सिंह की पीठ ने शुक्रवार को पारित एक आदेश में मामले को एमओईएफसीसी को भेज दिया, क्योंकि उठाए गए मुद्दों पर ‘‘आगे विचार’’ की आवश्यकता थी। पीठ में न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल भी शामिल थे।
एनजीटी ने निर्देश दिया कि मंत्रालय को ‘‘सीपीसीबी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) के परामर्श से स्पष्टीकरण देना होगा और औद्योगिक प्रक्रिया से उत्पन्न सामग्री को अवशिष्ट या उप-उत्पाद के रूप में पहचान के प्रारूप के उचित कार्यान्वयन के लिए तत्काल उपाय करने होंगे।’’
इसने मंत्रालय को तीन महीने के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी सौंपने को कहा।
मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 नवंबर की तारीख निर्धारित की गयी है।
याचिका ‘सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ एनवायरनमेंट एंड बायोडायवर्सिटी’ की ओर से दायर की गयी है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील संजय उपाध्याय ने कहा, ‘‘कानूनी स्पष्टता के अभाव’’ में यह गलत व्याख्या हुई कि ‘‘अवशिष्ट’’ क्या था और ‘‘उपोत्पाद’’ क्या।
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