विदेश की खबरें | न्यूरो वैज्ञानिक ने समझाया: कैसे जीन और आहार देते हैं स्वाद को आकार
श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

एन ऑर्बर (अमेरिका), 18 जून (द कन्वरसेशन) कभी आप ने गौर किया है कि क्यों हमिंग बर्ड ही फूलों का रस चूसती है? गौरैया, फिंचस और अधिकतर अन्य पक्षियों से अलग हमिंगबर्ड ही मधुरता का स्वाद ले सकती है क्योंकि उनकी आनुवांशिकी शर्करा अणुओं की पहचान करने के लिए जरूरी निर्देश देती है।

हमिंगबर्ड की तरह हम मानव भी शर्करा को महसूस कर सकते हैं क्योंकि हमारे डीएनए में अणुओं का पता लगाने का जीन अनुक्रमण कूट है जिसकी मदद से हम मिठास की पहचान कर पाते हैं।

लेकिन यह उससे कहीं जटिल है। हमारी मिठास को महसूस करने की क्षमता के साथ-साथ अन्य स्वादों की पहचान करने में आनुवांशिकी बनावट और गर्भ में रहने से लेकर खाने की मेज पर रात्रि भोजन में मौजूद खाद्य पदार्थों की अहम भूमिका होती है।

मेरे जैसे तंत्रिकातंत्र वैज्ञानिक (न्यूरोसाइंटिस्ट) यह समझने के लिए काम कर रहे हैं कि जीन और आहार के स्वाद के बीच यह जटिल परस्पर क्रिया कैसे होती है।

मिशिगन विश्वविद्यालय में मेरी प्रयोगशाला में, हम एक विशिष्ट पहलू में गहराई से अनुसंधान कर रहे हैं कि कैसे बहुत अधिक शक्कर का सेवन करने से मिठास की भावना कम हो जाती है।

स्वाद हमारे खाने की आदतों के केंद्र में है ऐसे में यह समझना कि जीन और पर्यावरण कैसे आकार लेते हैं, पोषण, खाद्य विज्ञान और रोग की रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण हैं।

स्वाद का अनुभव करने में जीन की भूमिका

हमिंगबर्ड्स की तरह, भोजन के स्वाद को अनुभव करने की मानव की क्षमता स्वाद रिसेप्टर्स की उपस्थिति पर निर्भर करती है।

ये अणुओं की पहचान करने वाले तत्व संवेदी कोशिकाओं पर पाए जाते हैं, जो जीभ की सतह पर संवेदी अंगों, स्वाद कलियों (टेस्ट बड) के अंदर स्थित होते हैं।

स्वाद रिसेप्टर्स और भोजन अणुओं के बीच संवाद पांच मूल स्वाद गुणों को जन्म देता है: मिठास, तीखापन, कड़वाहट, नमकीन और खट्टापन, जो विशिष्ट तंत्रिकाओं के माध्यम से मुंह से मस्तिष्क तक प्रेषित होते हैं।

उदाहरण के लिए, जब चीनी शर्करा रिसेप्टर से जुड़ती है, तो यह मिठास का संकेत देती है। दूसरों के ऊपर कुछ खाद्य पदार्थों के स्वाद के लिए हमारी सहज प्राथमिकता इस बात में निहित है कि हमारे विकासवादी इतिहास के दौरान जीभ और मस्तिष्क के संपर्क कैसे जुड़े।

नमक और चीनी जैसे आवश्यक पोषक तत्वों और ऊर्जा की उपस्थिति का संकेत देने वाले स्वाद गुण, मस्तिष्क के उस हिस्से को सूचना भेजते हैं जो आनंद की अनुभूति करने के लिए जिम्मेदार हैं।

इसके विपरीत, स्वाद जो हमें संभावित हानिकारक पदार्थों के प्रति सचेत करते हैं, जैसे कि कुछ विषाक्त पदार्थों की कड़वाहट, उस हिस्से से जुड़े होते हैं जो हमें असुविधा या दर्द महसूस कराते हैं।

जबकि हमारे डीएनए में कार्यात्मक स्वाद रिसेप्टर्स के लिए जीन कूट संदेश की उपस्थिति हमें खाद्य अणुओं का पता लगाने में सक्षम बनाती है, हम इन पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, यह हमारे द्वारा ले जाने वाले स्वाद जीन के विशेष संयोजन पर भी निर्भर करता है। आइसक्रीम की तरह, स्वाद रिसेप्टर्स सहित जीन, विभिन्न स्वादों में आते हैं।

उदाहरण के लिए कड़वाहट अनुभव करने के लिए जिम्मेदार स्वाद रिसेप्टर्स को टीएएस2आर38 कहते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि अलग-अलग लोगों में टीएएस2आर38 जीन के आनुवांशिकी कोड में मामूली अंतर होता है। यह आनुवांशिकी अंतर निर्धारित करता है कि व्यक्ति सब्जियों, बेरी और शराब की कड़वाहट को कैसे अनुभव करता है।

फॉलोअप अध्ययनों ने आनुवांशिकी कोड में अंतर और भोजन की पसंद में संबंध का संकेत दिया है खासतौर पर सब्जी और शराब के सेवन के संबंध में।

हमारे जीन भंडार में कहीं अधिक विविधता मौजूद है जिनमें मीठे के स्वाद रिसेप्टर भी शामिल हैं।

हालांकि, अब भी इस तथ्य का पता लगाने के लिए अध्ययन किया जा रहा है कि क्या और कैसे ये आनुवांशिक अंतर हमारे स्वाद और खाने की आदतों को प्रभावित करते हैं। एक बात निश्चित है कि जहां आनुवांशिकी स्वाद संवेदनाओं और वरीयताओं के लिए आधार तैयार करती है, वहीं भोजन के अनुभव उन्हें गहराई से नया आकार दे सकते हैं।

आहार कैसे स्वाद को प्रभावित करते हैं

हमारी कई सहज संवेदनाएं और प्राथमिकताएं भोजन को लेकर हमारे शुरुआती अनुभवों से आकार लेती हैं, कभी-कभी हमारे जन्म से पहले भी।

मां के आहार से कुछ अणु, जैसे लहसुन या गाजर, एमनियोटिक द्रव के माध्यम से भ्रूण की विकासशील स्वाद कलियों तक पहुंचते हैं और जन्म के बाद इन खाद्य पदार्थों के स्वाद बच्चे को प्रभावित कर सकते हैं।

शिशु के लिए बाजार में मिलने वाला तैयार भोजन भी बाद में बच्चे की भोजन वरीयता को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए, अनुसंधान से पता चलता है कि गाय के दूध पर आधारित शिशु आहार लेने वाले बच्चे जिसका स्वाद अमीनो एसिड के कारण अधिक कड़वा व खट्टा होता है वे दूध पीने वालों की तुलना में दूध पीने के बाद सब्जियों जैसे कड़वे, खट्टे और नमकीन खाद्य पदार्थों को अधिक सहजता से स्वीकार करते हैं।

इसी प्रकार जो बच्चे शर्करा युक्त पानी पीते हैं वे दो साल तक अधिक मीठा पेय पदार्थ पसंद करते हैं।

हमारे स्वाद का पूर्वाभास प्रारंभिक जीवन के भोजन से ही सीमित नहीं रहता है, बल्कि वयस्क अवस्था में हम क्या खाते हैं, विशेष रूप से चीनी और नमक का सेवन, यह भी तय कर सकता है कि हम कैसे भोजन को देखते हैं और संभावित रूप से किस भोजन को चुनते हैं।

हमारे आहार में सोडियम को कम करने से हमारे पसंदीदा स्तर का नमकीनपन कम हो जाता है, जबकि अधिक सेवन करने से हम अधिक नमकीन खाद्य पदार्थ पसंद करते हैं।

चीनी के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है, आहार में चीनी कम करने से आपको खाना मीठा लग सकता है।

इसके विपरीत, जैसा कि चूहों और मक्खियों में शोध से पता चलता है, उच्च शर्करा का स्तर आपकी मिठास की अनुभूति को कम कर सकता है।

यद्यपि हम अनुसंधानकर्ता अभी भी इस तथ्य का पता लगाने के लिए काम कर रहे हैं कि यह कैसे और क्यों इस तरह काम करता है। पशुओं पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च शर्करा और वसा का सेवन स्वाद कोशिकाओं और तंत्रिकाओं की शर्करा के प्रति प्रतिक्रिया को कम करता है, उपलब्ध स्वाद कोशिकाओं की संख्या में बदलाव करता है और यहां तक ​​कि स्वाद संबंधी डीएनए में आनुवांशिकी बदलाव करता है।

मेरी प्रयोगशाला में, हमने देखा कि आहार से अतिरिक्त शर्करा हटा देने पर चूहों में ये स्वाद परिवर्तन हफ्तों के भीतर सामान्य हो जाते हैं।

आनुवांशिकी और भोजन केवल स्वाद को प्रभावित करने वाले कारक नहीं हैं, बल्कि बीमारी भी स्वाद को प्रभावित कर सकती है।

जैसा कि हममें से कई लोगों ने कोविड-19 महामारी के चरम पर होने पर देखा था कि स्वाद में बीमारी भी एक भूमिका निभा सकती है। कोविड-19 संक्रमण की पुष्टि होने के बाद मैं महीनों तक मीठे, कड़वे और खट्टे खाद्य पदार्थों के बीच अंतर नहीं बता सका।

अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि सार्स कोव-2 से संक्रमित लगभग 40 प्रतिशत लोगों ने स्वाद और गंध का अनुभव नहीं होने की शिकायत की। इनमें से करीब पांच प्रतिशत लोगों में स्वाद की ये कमी महीनों और वर्षों तक बनी रही।

हालांकि, अनुसंधानकर्ता इन संवेदी परिवर्तनों के कारण को समझ नहीं पाए हैं। एक प्रमुख परिकल्पना यह है कि वायरस उन कोशिकाओं को संक्रमित करता है जो स्वाद और गंध रिसेप्टर्स का सहयोग करती हैं।

खाने की आदतों को आकार देकर, जीन, आहार, बीमारी और स्वाद के बीच जटिल संबंध के जरिये स्वाद कलियों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। हालांकि, बीमारी और स्वाद गंभीर बीमारियों के खतरे को प्रभावित कर सकता है।

विषाक्त पदार्थों से भोजन को अलग करने से परे, मस्तिष्क स्वाद संकेतों का इस्तेमाल खाने की शक्ति का आकलन करने के लिए छद्म की तरह करता है। प्रकृति में, मिठास या नमकीनता के संदर्भ में भोजन का तेज स्वाद प्रत्यक्ष रूप से उसके पोषक स्तर और कैलोरी सामग्री से जुड़ा होता है।

उदाहरण के लिए, एक आम में एक कप स्ट्रॉबेरी की तुलना में पांच गुना अधिक शर्करा होती है, और यही कारण है कि इसका स्वाद मीठा और अधिक पेट भरने वाला प्रतीत होता है।

इस प्रकार, स्वाद न केवल भोजन के आनंद और पसंद के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भोजन के सेवन को विनियमित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

जब आहार या बीमारी से स्वाद बदल जाता है, तो संवेदी और पोषक तत्वों की (मस्तिष्क को भेजी जाने वाली) जानकारी ‘अलग’ हो सकती है और इसकी वजह से हमारे मस्तिष्क को सही जानकारी प्रदान नहीं करती। अनुसंधान से पता चलता है कि यह कृत्रिम शर्करा के सेवन से भी हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि हमने मक्खियों पर किए अनुसंधान में खाने की कई परिपाटी और मस्तिष्क परिवर्तन देखा है और यह उन लोगों में भी खोजे गए हैं जो उच्च शर्करा या वसा वाले पदार्थ खाते हैं या जिनका बॉडी-मास इंडेक्स (बीएमआई) अधिक था।

इससे यह सवाल उठता है कि क्या ये प्रभाव हमारे दिमाग में स्वाद और संवेदी परिवर्तन से भी उत्पन्न होते हैं।

लेकिन स्वाद की अनुकूलनीय प्रकृति को लेकर उम्मीद की किरण है। चूंकि आहार हमारी इंद्रियों को आकार देता है, हम वास्तव में चीनी और नमक की कम मात्रा वाले खाद्य पदार्थों से प्रतिक्रिया करने व पसंद करने को लेकर अपनी स्वाद कलियों को प्रशिक्षित कर सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि बहुत से लोग पहले से ही कहते हैं कि वे खाद्य पदार्थों को अत्यधिक मीठा पाते हैं, जो आश्चर्यजनक नहीं हो सकता क्योंकि 60 प्रतिशत से 70 प्रतिशत किराने की दुकान के खाद्य पदार्थों में अतिरिक्त चीनी होती है।

हमारे जीन के अनुरूप खाद्य पदार्थों को सुधारना और हमारी स्वाद कलियों की अनुकूल तरीके से ढालने से पोषण बढ़ाने, स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और पुरानी बीमारी के बोझ को कम करने का एक व्यावहारिक और शक्तिशाली माध्यम हो सकता है।

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