गुवाहाटी, 23 जनवरी असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने सोमवार को कहा कि नेताजी की लोकप्रियता और ब्रिटिश सशस्त्र बलों में भारतीयों का द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिन्द फौज (आईएनए) में शामिल होना भारत के स्वतंत्रता हासिल करने का प्राथमिक कारण था। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों द्वारा स्वतंत्रता सेनानी के योगदान को “काफी हद तक उपेक्षित” किया गया है।
शर्मा नेताजी की 126वीं जयंती के अवसर पर यहां एक कार्यक्रम में लोगों को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि इतिहास ने उनके साथ उचित न्याय नहीं किया है और “समय आ गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दिशा में पहल करने के साथ उनके योगदान का गहन और व्यावहारिक विश्लेषण किया जाए।”
शर्मा ने दावा किया कि ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस का साथ नहीं दिया बल्कि अनुशासित सैनिकों के रूप में उन्होंने अंग्रेजों का समर्थन किया था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब उन्हें नेताजी द्वारा आईएनए की स्थापना के प्रयासों और उनके कई पूर्व सहयोगियों, विशेष रूप से सिंगापुर में शामिल होने के बारे में पता चला, तो उनका “हृदय परिवर्तन” हुआ।
उनमें से कई ने आईएनए सदस्यों के लाल किला मामले में सुनवाई के दौरान विद्रोह किया जब उन्हें एहसास हुआ कि “हम क्या कर रहे हैं। हमारे साथियों ने इतना बलिदान दिया है और हम अंग्रेजों के प्रति वफादार हैं।”
मुख्यमंत्री ने कहा, “जब उनके सशस्त्र बलों में भारतीयों ने विद्रोह किया तो अंग्रेजों ने महसूस किया कि उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करनी होगी। इसका उल्लेख तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने पूर्व प्रथम भारतीय प्रधान न्यायाधीश पी. वी. चक्रवर्ती के 1956 में कलकत्ता दौरे के दौरान उनसे किया था।
शर्मा ने कहा, “जब चक्रवर्ती ने यह जानना चाहा कि अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्रता देने के लिए किस चीज ने बाध्य किया था, तो क्लेमेंट ने जवाब दिया था कि यह नेताजी की “लोकप्रियता और ब्रिटिश सेना में भारतीयों का आईएनए में शामिल होना था”, जिसका उल्लेख उनकी पुस्तक ‘बंगाल का इतिहास’ में मिलता है।”
एटली ने कहा था कि जब भारतीय सेना के जवानों ने अंग्रेजों का साथ नहीं दिया तो उन्हें अहसास हुआ कि अब वे भारत में नहीं रह सकते।
मुख्यमंत्री ने कहा, “यह केवल नेताजी के प्रयासों और बलिदानों के कारण ही संभव हो पाया है। लेकिन स्वतंत्रता का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों, ज्यादातर वामपंथी विचारधारा के समर्थकों ने इसका उल्लेख नहीं किया और लोगों से उनके योगदान को दूर रखा।”
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