बेंगलुरु, 10 मार्च कर्नाटक विधानसभा ने उधारकर्ताओं को सूक्ष्म-वित्त संस्थानों (एमएफआई) के उत्पीड़न से बचाने और एवं जबरन वूसली पर लगाम के लिए लाए गए विधेयक को सोमवार को ध्वनिमत से पारित ककर दिया।
इस विधेयक में दोषियों के लिए 10 साल तक के कारावास और उल्लंघन के लिए पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की तरफ से कानून और संसदीय मामलों के मंत्री एच के पाटिल ने इस विधेयक को विधानसभा में पेश किया। विधानसभा ने कर्नाटक सूक्ष्म ऋण एवं लघु ऋण (जबरन कार्रवाई पर लगाम) विधेयक, 2025 को ध्वनि मत से निर्विरोध पारित कर दिया।
यह विधेयक कर्नाटक सूक्ष्म ऋण एवं लघु ऋण (जबरन कार्रवाई पर लगाम) अध्यादेश की जगह लेगा, जिसे 12 फरवरी को जारी किया गया था।
सरकार ने कर्ज में फंसे लोगों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या और राज्य के विभिन्न हिस्सों से सूक्ष्म-वित्त कंपनियों के ऋण वसूली के लिए हिंसक तरीके अपनाने को लेकर मिली शिकायतों के बाद यह अध्यादेश लाने का फैसला किया था।
इस विधेयक के मुताबिक, सभी सूक्ष्म-वित्त संस्थानों, धन उधार देने वाली एजेंसियों और ऋणदाताओं को 30 दिन के भीतर स्थानीय उपायुक्त के पास पंजीकरण कराना होगा।
यह विधेयक ‘जबर्दस्ती’ ऋण वसूली के तरीकों पर रोक लगाता है। अगर सूक्ष्म-वित्त कंपनियों या ऋणदाताओं के दबाव, हिंसा, अपमान, निजी/आउटसोर्स एजेंसियों, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के इस्तेमाल की शिकायतें मिलती हैं तो अधिकारी उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं।
यह उधारकर्ता से कोई भी ऐसा दस्तावेज जबरन लेने की मांग करने पर भी रोक लगाता है जो उधारकर्ता को किसी भी सरकारी कार्यक्रम के तहत लाभ का हकदार बनाता है।
पाटिल ने यह विधेयक सदन में पेश करते समय कहा कि ऋण वसूली के लिए अपनाए गए तरीकों के कारण कुछ लोगों का आत्मविश्वास खत्म हो गया और करीब 15 लोगों ने आत्महत्या कर ली तथा कई मामलों में उधारकर्ता अपने घर या गांव छोड़कर भाग गए।
उन्होंने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य ऋण वसूली के उन तरीकों को रोकना है, जो मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं तथा उधारकर्ताओं की गरिमा की रक्षा करना है।
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