नागपुर, 29 अगस्त बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और नागपुर विश्वविद्यालय (आरटीएमएनयू) को निर्देश दिया है कि वे पूर्व प्राध्यापक शोमा सेन को उनकी ‘ग्रेच्युटी’ (उपदान) और भविष्य निधि (पीएफ) के तहत पांच-पांच लाख रुपये अदा करें।
सेन कोरेगांव भीमा-एल्गार परिषद मामले में एक आरोपी हैं। वह फिलहाल जेल में हैं।
सेन ने उच्च न्यायालय का रुख कर दावा किया कि ‘राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपूर विद्यापीठ’ (आरटीएमएनयू) ने 2018 में उनकी सेवानिवृतति के बाद उनकी ग्रेच्युटी और भविष्य निधि रोक ली है।
उल्लेखनीय है ग्रेच्युटी नौकरी पेशा व्यक्तियों को सेवानिवृत्त होने पर या बीच में नौकरी छोड़ने पर नियोक्ता द्वारा दी जाने वाली एक निश्चित धनराशि है। यह आमतौर पर पांच साल की सेवा पूरी करने पर दी जाती है।
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उच्च न्यायालय ने इस महीने की शुरूआत में आरटीएमएनयू को निर्देश दिया था कि वह सेन को अंतरिम राहत के तौर पर पांच लाख रुपये अदा करे।
हालांकि, आरटीएमएनयू ने एक अर्जी दायर कर यह रकम सेन को सीधे सौंपने के बजाय अदालत की रजिस्ट्री में जमा करने की अनुमति मांगी।
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति रवि देशपांडे की पीठ ने शुक्रवार को आरटीएमएनयू और सेन की अर्जियों पर सुनवाई करते हुए इस बात का जिक्र किया कि आरटीएमएनयू ने सेन के पेंशन के कागजात आगे बढ़ाने से हाथ खींच लिए हैं।
अदालत ने कहा, ‘‘यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मुश्किल समय में एक सेवानिवृत्त शिक्षक को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है और विश्वविद्यालय उनकी सुध नहीं ले रहा है और उनके बकाये का भुगतान करने में रूचि भी नहीं ले रहा। ’’
सेन के अधिवक्ता प्रकाश केघे ने अदालत से कहा कि उनकी मुवक्किल गेच्युटी के रूप में 14 लाख रुपये पाने की हकदार हैं।
इस पर, पीठ ने अदालत की रजिस्ट्री में धन जमा करने की आरटीएमएनयू की अर्जी खारिज कर दी।
अदालत ने आदेश दिया, ‘‘हम विश्वविद्यालय को निर्देश देते हैं कि वह एक हफ्ते के अंदर याचिकाकर्ता को पांच लाख रुपये अदा करे। ’’
पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को भी सेन के पक्ष में पांच लाख रुपये की अतिरिक्त रकम एक महीने के अंदर अस्थायी आधार पर जारी करने का निर्देश दिया। साथ ही इस बात का जिक्र किया कि सेन ग्रेच्युटी और पीएफ के रूप में अधिक रकम पाने की हकदार हैं।
सेन विश्वविद्यालय की अंग्रेजी विभाग में नियुक्त थी और जुलाई 2018 में सेवानिवृत्त हुई।
उनकी गिरफ्तारी के बाद विश्वविद्यालय ने जून 2018 में उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया था और उन्हें सेवानिवृत्ति के सारे लाभों से भी वंचित कर दिया था।
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