नयी दिल्ली, 14 सितंबर उच्चतम न्यायालय से जनप्रतिनिधि अधिनियम में उल्लेखित अपराधों में दोषी करार दिए गए जनप्रतिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने पर विचार करने का आग्रह किया गया है।
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को अन्य नागरिकों से ‘‘अधिक पवित्र’’ होना चाहिए।
नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत की मदद के लिए नियुक्त न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने नयी रिपोर्ट दायर की जिसमें नैतिक कदाचर के मामलों में दोषी करार दिए जाने पर जनप्रतिनिधियों के आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का समर्थन किया गया है।
अदालत में जमा 19वीं रिपोर्ट में हंसारिया की सहायता अधिवक्ता स्नेहा कलिता ने की है जिसमें जनप्रतिनिधि कानून की धारा-8 का संदर्भ दिया गया है जो कहती है कि दोषी नेताओं पर सजा पूरी होने के बाद छह साल तक चुनावी राजनीति में प्रवेश करने पर रोक होगी।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘सजा पूरी होने के बाद छह साल तक अयोग्य करार देने और दोबारा सदन का सदस्य बनने में कोई संबंध नहीं है।’’ इसमें कहा गया कि रिहा होने के छह साल बाद चुनावी राजनीति में वापसी ‘‘संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।’’
इस रिपोर्ट पर 15 सितंबर को प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करेगी। इसमें कहा गया कि संसद ने अयोग्यता के लिए अपराधों को उनकी प्रकृति, गंभीरता तथा बड़े पैमाने पर समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर वर्गीकृत किया है।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY