विदेश की खबरें | ‘दमन’ और ‘अमानवीयता’ की पड़ताल करता है कुंदेरा का शानदार रचना संसार
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मेलबर्न, 14 जुलाई (द कन्वरसेशन) प्रख्यात उपन्यासकार, निबंधकार, कवि, दार्शनिक और राजनीतिक आलोचक मिलान कुंदेरा 94 वर्ष की आयु में दुनिया को छोड़कर चले गए । ऐसा लगता है कि अंतिम विदाई की यह घड़ी बहुत जल्दी आ गई। और ऐसा लगने का कारण संभवत: यह है कि जो कुछ भी उन्होंने लिखा, उसमें उन्होंने चिंतन, लेखन और अध्ययन के नए रास्ते खोले । उनकी साहित्यिक मौजूदगी में दुनिया एक नई ऊंचाई को छूती प्रतीत होती है।

कुंदेरा एक खास वक्त में पैदा हुए थे- एक अप्रैल (1929): अप्रैल फूल डे । शुरूआती जीवन में ही उनका सामना मानव संस्कृति की निरर्थकता से हुआ और उन्होंने खुद को इसमें डुबो लिया। बचपन और लड़कपन उस माहौल में बीता, जब चेकोस्लोवाकिया नाजियों के कब्जे में था, इसके बाद उन्होंने स्टालिनवादी सत्ता का स्वाद चखा जहां वह कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे ।

1998 में मुझे उनकी एक रचना हाथ लगी । उसके बाद से मैं कई दशकों से कुंदेरा को पढ़ रहा हूं, उनका हवाला देता रहा हूं और उनके रचना संसार को पढ़ा रहा हूं । उस समय मैं पश्चिमी आस्ट्रेलिया में भेड़ों के एक फार्म पर रह रहा था। वहां एक शख्स आए जिन्होंने ‘दी बुक आफ लाफ्टर एंड फोरगैटिंग’ थमा दी। कुंदेरा के इस तीसरे उपन्यास ने, एक स्थिर सत्य की अनुपस्थिति ने मेरी बेचैनी पर मोहर लगा दी । समाज बहुत विखंडित है लेकिन इसके बावजूद उससे जुड़ने की अपनी चाह को काबू करने में मैं स्वयं को अक्षम पाता हूं और यही बात कुंदेरा भी इस किताब में कहते हैं ।

उपन्यास के एक भाग में वफादार कम्युनिस्टों का एक समूह घेरा बनाकर एक साथ नाच रहा है, ये समूह हवा में ऊपर उठता है और शहर के ऊपर उड़ान भरने लगता है। वे फरिश्तों की सी हंसी हंस रहे हैं लेकिन उनके नीचे जल्लाद और हत्यारे राजनीतिक कैदियों को मौत के घाट उतारने में लगे हैं । इस भाग का सूत्रधार कहता है जो जरूरी नहीं कि उस समूह का हिस्सा हो :

‘ सीने में उठती आक्रोश की ज्वाला के साथ मैं महसूस करता हूं कि वे पक्षियों की तरह उड़ रहे हैं और मैं किसी पत्थर की तरह नीचे गिर रहा हूं .... कि उनके पास पंख थे और ऐसे पंख मुझे कभी नहीं मिले।’

हास्यबोध के साथ सर्वसत्तावाद से सवाल करते कुंदेरा को दमन और अमानवीयता की जानकारी थी। ‘ए वाइड गार्डन’ (1953) उनका पहला काव्य संकलन था जो मात्र 24 साल की उम्र में प्रकाशित हुआ था - इसका भाव और विषय वस्तु सोवियतवादी पुट लिए थी।

लेकिन 1967 में लिखा गया उनका पहला उपन्यास ‘दी जोक’ और 1969 में लिखा गया ‘लाइफ इन ऐल्सवेयर’ (1973 में प्रकाशित) पूरी तरह राजनीतिक व्यंग्य को अपने में समेटे हुए थे । नतीजतन कुंदेरा को कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा गया गया और अंतत: वह निर्वासन में चले गए।

‘दी अनबियरेबल लाइटनेस आफ बीइंग’ कुंदेरा ने 1984 में लिखा और इसे उनके सर्वाधिक सराहे गए उपन्यासों में से एक माना जाता है। इसमें भी उन्होंने सर्वसत्तावाद पर सवालिया निशान लगाना जारी रखा । उनकी कलम प्राग स्प्रिंग और सोवियत नियंत्रण वाले चेकोस्लोवाकिया की नृशंसता को पन्नों पर उतारते हुए रोती रही। 1988 में इसी उपन्यास पर एक फिल्म भी बनायी गयी जिसमें डेनियल डे, लेविस और जुलिएट बिनोशे मुख्य भूमिका में थे।

यह विषय बहुत गंभीर जान पड़ता है लेकिन अपने प्रत्येक उपन्यास में कुंदेरा ने कुछ हास्यबोध का भी सहारा लिया । उदाहरण के लिए ‘अनबियरेबल लाइटनेस’ में सूत्रधार नित्शे के ‘शाश्वत पुनरावृत्ति का सिद्धांत’ - इस बात की संभावना कि हम एक ही जीवन को बार बार जीते हैं, पर विचार विमर्श करता है। लेकिन इसके साथ ही वह एक कामुक विमर्श भी गढ़ता है जो यह सुझाता प्रतीत होता है कि उल्लास से भरपूर सेक्स हमें उस क्षण में संपूर्णता में जीने में मदद कर सकता है। हम बार बार पैदा होने के बोझ को उस क्षण में, जीवित रहकर अभी और इसी समय हल्का कर सकते हैं ।

भार और हल्कापन, हँसी और विस्मृति, दोहराव और परिवर्तन, राजनीति और सेक्स: उनके पहले चार उपन्यासों में ऐसे द्वंद्व शामिल हैं। इस प्रकार के वैचारिक विरोधाभास को एक साथ संभालने की कुंदेरा की क्षमता को उस बात से समझा जा सकता है जो उन्होंने फिलिप रॉथ से कही थी:

‘पूर्णसत्तावाद न केवल नरक है बल्कि यह स्वर्ग का स्वप्न भी है -एक दुनिया का सदियों से देखा जा रहा ख्वाब जहां हर कोई प्यार प्रेम से रहेगा। ’

लेखक निर्वासन में

स्वर्ग का यह कुंदेरा का सपना कभी हकीकत नहीं बन पाया और वह अपना घर छोड़कर निर्वासित जीवन जीने के लिए फ्रांस चले गए और वहां भी अपना रचना संसार रचते रहे।

लेखन में ऐसी गंभीरता और शैली में महारत रखने वाले लेखक कुंदेरा के बारे में किसी को भी लगेगा कि उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला होगा । लेकिन यह उनकी लेखन शैली थी शायद जिसके चलते उन्हें कई बार इस पुरस्कार के लिए नामित किया गया लेकिन कभी चुना नहीं गया।

कुंदेरा के लिए उपन्यास एक तकनीकी वस्तु है जो दुनिया को देखने की नई दृष्टि और उनकी समझ प्रदान करता है। और यह देखना तथा समझना उनके उपन्यासों में समाहित है।

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