देश की खबरें | कर्नाटक: अनुसूचित जातियों के बीच आंतरिक आरक्षण की सिफारिश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई

बेंगलुरु, 19 मई कर्नाटक की निवर्तमान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा की गई आंतरिक आरक्षण की सिफारिश को उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गई है।

न्यायमूर्ति अनंत रामनाथ हेगड़े की एक अवकाशकालीन पीठ ने याचिका पर सुनवाई की और मुख्य सचिव तथा समाज कल्याण विभाग को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। अदालत ने सुनवाई 25 मई के लिए स्थगित कर दी।

जनहित याचिका बेंगलुरु निवासी एवं मीसालथी समरक्षना ओकुथा के प्रमुख एच रवि ने दायर की है। संगठन ने याचिका में दावा किया है कि निवर्तमान कानून मंत्री जे सी मधुस्वामी की अध्यक्षता वाली एक कैबिनेट उप समिति ने 101 अनुसूचित जातियों (एससी) को चार समूहों में श्रेणीबद्ध किया और इन चार समूहों में से समुदाय के लिए 17 प्रतिशत आरक्षण को विभाजित किया।

याचिका में कहा गया है कि उप समिति की सिफारिश को निवर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की अध्यक्षता वाले मंत्रिमंडल ने 27 मार्च 2023 को स्वीकार कर लिया था। राज्यपाल से मंजूरी मिलने के बाद, आवश्यक संवैधानिक संशोधन के लिए इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।

याचिका में कहा गया है, ‘‘उप समिति की रिपोर्ट की प्रति भी लोगों के बीच उपलब्ध नहीं है और इसलिए याचिकाकर्ता उसे माननीय अदालत के समक्ष पेश कर पाने में सक्षम नहीं है।’’

याचिका में आरोप लगाया गया है अनुसूचित जातियों के विभिन्न श्रेणियों के बीच नये सिरे से कोटा का निर्धारण मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का हनन करता है।

उप समिति की सिफारिश में, छह प्रतिशत आरक्षण के साथ समूह-एक में चार जातियों --आदि द्रविड़, भांबी, मदिगा, समग्रा-- को रखा गया है।

समूह-दो में 5.5 प्रतिशत आरक्षण के साथ आदि कर्नाटक, चलवाडी, चन्नादासरा, होलेय और माहर हैं। समूह-तीन में 4.5 प्रतिशत आरक्षण के साथ बंजारा, भोवी, कोरचा, कोरमा जातियां शामिल की गई हैं। वहीं, एक प्रतिशत आरक्षण के साथ समूह-चार में शेष जातियों को रखा गया हैं।

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