देश की खबरें | पिछले दशक में भारत सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था रहा : उपराष्ट्रपति धनखड़

तिरुवनंतपुरम, दो मार्च उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने रविवार को कहा कि देश ने पिछले एक दशक में तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज की है और इस दौरान यह सबसे तेजी आगे बढ़ने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था बन गया है।

उपराष्ट्रपति ने यहां भारतीय विचार केंद्र द्वारा आयोजित चौथे ‘पी. परमेश्वरन स्मृति व्याख्यान’ में कहा कि 1989 में जब वह सांसद थे और 1991 में जब वह केंद्रीय मंत्री थे, तब ‘‘माहौल हमें प्रेरित नहीं करता था।’’

पी. परमेश्वरन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सबसे वरिष्ठ प्रचारकों में से एक थे और पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के पूर्व नेता थे।

धनखड़ ने कहा, ‘‘अब हमारा भारत सकारात्मकता और संभावनाओं से भरा हुआ है। यह आशा और आकांक्षाओं से भरा है। हर तरफ और हर जगह हम आशा और संभावनाओं का पारिस्थितिकी तंत्र देख सकते हैं। भारत ने पिछले एक दशक में तेजी से आर्थिक उछाल देखा है।’’

उन्होंने कहा कि देश पांचवीं सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था है और ‘‘बहुत जल्द चार हजार अरब अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘भारत आठ प्रतिशत की औसत वृद्धि के साथ पिछले एक दशक में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली वैश्विक अर्थव्यवस्था है।’’

धनखड़ ने यह भी कहा कि भारत को अब सपेरों का देश नहीं कहा जाता, बल्कि ‘‘यह अपनी क्षमता से पूरे विश्व को आकर्षित कर रहा है’’।

देश की विकास गति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश में अभूतपूर्व बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘जन-केंद्रित नीतियों और पारदर्शी जवाबदेह शासन ने पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा दिया है।’’

धनखड़ ने देश में राजनीतिक रूप से विभाजनकारी माहौल का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश कुछ पहलुओं पर ‘‘खतरनाक रूप से चिंताजनक परिदृश्यों’’ का सामना कर रहा है क्योंकि राजनीति ध्रुवीकृत और विभाजनकारी हो गई है।

उन्होंने संसद में ‘‘अशांति और व्यवधान’’ का उल्लेख करते हुए संवाद और विचार-विमर्श के महत्व को भी रेखांकित किया।

उन्होंने कहा, ‘‘संसद को लोगों के लिए आदर्श होना चाहिए। यह लोगों की आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदलने का मंच है। इसे संवाद, बहस, चर्चा और विचार-विमर्श का अभेद्य गढ़ होना चाहिए।’’

धनखड़ ने कहा, ‘‘और आज हम क्या देख रहे हैं? संवाद, विचार-विमर्श और अन्य चीजें अशांति और व्यवधान की भेंट चढ़ गई हैं।’’

उन्होंने कहा कि देश ऐसे हालात का सामना कर रहा है जहां राष्ट्रीय हित को दरकिनार कर दिया गया है और ‘‘राष्ट्र-विरोधी विमर्श को बढ़ावा मिल रहा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम बहुत खतरनाक दौर में जी रहे हैं। राष्ट्रवाद की कीमत पर पक्षपातपूर्ण और व्यक्तिगत हितों को बढ़ावा देने वाली राजनीतिक असहिष्णुता और लापरवाहपूर्ण रवैये पर लगाम लगाये जाने की जरूरत है।’’

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