नयी दिल्ली, एक अप्रैल कांग्रेस ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) से जुड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक पुराने बयान का हवाला देते हुए सोमवार को आरोप लगाया कि पिछले वर्ष मनरेगा में काम के दिनों की संख्या में वृद्धि मोदी सरकार की विफलताओं का एक ‘‘जीता जागता स्मारक’’ है।
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया कि वित्त वर्ष 2023-24 में ग़रीब ग्रामीण परिवारों द्वारा मांगे गए काम के दिनों की संख्या 305 करोड़ हो गई है जो कोविड महामारी से पहले की तुलना में 40 करोड़ अधिक है।
रमेश ने एक बयान में दावा किया, ‘‘ बेरोज़गारी और मजदूरी का न बढ़ाना मोदी सरकार के 10 साल के ‘अन्याय काल’ की सबसे बड़ी सच्चाई है। मोदी सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक कुप्रबंधन, नोटबंदी, ग़लत ढंग से डिज़ाइन की गई जीएसटी और बिना किसी तैयारी के लगाए गए लॉकडाउन के जो आर्थिक संकट उत्पन्न हुए हैं, उनसे ग्रामीण भारत अभी भी जूझ रहा है।’’
उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय शुरू किए गए मनरेगा के तहत आर्थिक संकट होने पर भी 100 दिनों के रोज़गार की गारंटी होती है।
रमेश का कहना है, ‘‘यह मांग के आधार पर चलने वाला कार्यक्रम है, जिसका अर्थ है कि इसमें रोज़गार के अवसर तभी उत्पन्न होते हैं जब बेहतर मज़दूरी का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है।’’
उन्होंने दावा किया, ‘‘वित्त वर्ष 2023-24 में ग़रीब ग्रामीण परिवारों द्वारा मांगे गए काम के दिनों की संख्या 305 करोड़ हो गई है। यह संख्या महामारी से पहले की तुलना में 40 करोड़ अधिक है। आज भारत में नौकरियों की इतनी भारी कमी है कि हमारे ग़रीबों को रोज़गार के आख़िरी विकल्प की ओर ही जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।’’
कांग्रेस महासचिव के अनुसार, फरवरी 2015 में, सत्ता संभालने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में कहा था कि मनरेगा कांग्रेस की विफलताओं का एक ‘‘जीता जागता स्मारक’’ है, लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान मोदी सरकार को लोगों की आय के लिए प्राथमिक स्रोत के रूप में मनरेगा पर ही निर्भर रहना पड़ा था।
उन्होंने दावा किया आज के ‘‘मोदी मेड आर्थिक संकट’’ के बीच भी मनरेगा वही भूमिका निभा रहा है।
रमेश ने आरोप लगाया कि पिछले वर्ष मनरेगा में काम के दिनों की संख्या में वृद्धि दरअसल मोदी सरकार की विफलताओं का एक ‘‘जीता जागता स्मारक’’ है।
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