देश की खबरें | उच्च न्यायालय ने पंजाब के पूर्व डीजीपी की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. चंडीगढ़ से वर्ष 1991 में लापता हुए एक व्यक्ति से संबंधित मामले में गिरफ्तारी का सामना कर रहे पंजाब पुलिस के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सुमेध सिंह सैनी की अग्रिम जमानत याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

चंडीगढ़, सात सितंबर चंडीगढ़ से वर्ष 1991 में लापता हुए एक व्यक्ति से संबंधित मामले में गिरफ्तारी का सामना कर रहे पंजाब पुलिस के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सुमेध सिंह सैनी की अग्रिम जमानत याचिका पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

न्यायमूर्ति फतेहदीप सिंह की पीठ ने सैनी की उस याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें सैनी ने 1991 में लापता हुए इंजीनियर बलवंत सिंह मुल्तानी के मुकदमे को रद्द करने अथवा जांच सीबीआई को सौंपे जाने का अनुरोध किया है।

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पीठ ने विशेष लोक अभियोजक सरतेज सिंह नरूला और सैनी के वकील की दलीलें सुनने के बाद पूर्व डीजीपी की दो याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

सैनी की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि मामले में शामिल अन्य आरोपियों का पता लगाने और कहां एवं कैसे मुल्तानी के शव को ठिकाने लगाया गया, इसका पता लगाने के लिए उन्हें सैनी को हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता है।

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नरूला ने कहा कि मामले में चार घंटे से अधिक समय तक बहस हुई।

उन्होंने कहा कि मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

मोहाली की एक अदालत ने गत एक सितंबर को इस मामले में पूर्व पुलिस महानिदेशक की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

चंडीगढ़ औद्योगिक एवं पर्यटन निगम में कनिष्ठ अभियंता रहे बलवंत सिंह मुल्तानी की गुमशुदगी के सिलसिले में पूर्व डीजीपी के खिलाफ इस साल मई में मामला दर्ज किया गया था।

मोहाली के रहने वाले मुल्तानी को सैनी पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पुलिस ने पकड़ा था। प्राथमिकी के मुताबिक, 1991 में घटना के वक्त सैनी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे।

सैनी तथा छह अन्य के खिलाफ मुल्तानी के भाई पलविंदर की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था।

अदालत ने 21 अगस्त को पंजाब पुलिस को सैनी के खिलाफ इस मामले में हत्या का आरोप जोड़ने की अनुमति दी थी।

गुमशुदगी के इस मामले में सह-आरोपी चंडीगढ़ पुलिस के दो अधिकारी सरकारी गवाह बन गए थे जिसके बाद अदालत ने यह फैसला दिया था।

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