मुंबई, 20 अगस्त बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग (एमएसएचआरसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें आयोग ने एक पुलिस निरीक्षक को एक महिला को उसके बेटे की मौत की जांच में लापरवाही के लिए दो लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था।
अदालत ने मानवाधिकार आयोग के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि पुलिसकर्मी को उसका पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया था।
न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने नौ अगस्त के फैसले में आयोग के आदेश को रद्द कर दिया और मामले की नये सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया है।
आदेश की प्रति मंगलवार को उपलब्ध कराई गयी।
अदालत ने कहा कि आयोग ने नवी मुंबई अपराध शाखा में तैनात याचिकाकर्ता अबासाहेब आनंदराव पाटिल के खिलाफ आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना था।
पीठ ने कहा, “हम पाते हैं कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया है, और महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग को आरोपों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को नोटिस जारी करना चाहिए था।”
अदालत ने पाटिल और अन्य की सुनवाई के बाद मामले को नए सिरे से विचार के लिए आयोग को वापस भेज दिया।
अदालत ने कहा, “मामले की गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने से पहले, महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग से अनुरोध है कि वह याचिकाकर्ता एवं अन्य अधिकारियों को नोटिस भेजकर उन्हें मुआवजा देने और/या उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के संबंध में निर्देश जारी करे।”
पाटिल ने अपनी याचिका में एमएसएचआरसी के जुलाई 2022 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें एक महिला को मुआवजे के रूप में दो लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया था। महिला ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने एक दुर्घटना में मारे गए उसके बेटे की मौत की ठीक से जांच नहीं की थी।
महिला ने आरोप लगाया कि उनके बेटे की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत के बावजूद पुलिस ने मामले की जांच नहीं की।
मुआवजे के अलावा, आयोग ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को पाटिल और अन्य के खिलाफ घोर लापरवाही के लिए विभागीय जांच करने का भी निर्देश दिया था।
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