प्रयागराज, नौ अक्टूबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सात अक्टूबर, 2020 को पारित एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार और प्रदेश के सभी विकास प्राधिकरणों को कंपाउडिंग स्कीम, 2020 के मुताबिक किसी भी अवैध निर्माण को वैध निर्माण में मिलाने से रोक दिया है।
राज्य सरकार द्वारा 15 जुलाई, 2020 को अधिसूचित की गई इस स्कीम के तहत भवन उप नियम में जिन निर्माण की अनुमति नहीं है, उसे समाधेय (कंपाउंडेबल) बना दिया गया है।
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मोहम्मद मेहरबान अंसारी और अन्य तीन लोगों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा ने संबंधित विभाग के अपर सचिव को 'कंपाउडिंग स्कीम' को न्यायोचित ठहराते हुए जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई की तारीख 20 अक्टूबर, 2020 तय की।
अदालत ने कहा, “प्रथम दृष्टया कंपाउडिंग स्कीम 2020 के अवलोकन से पता चलता है कि अवैध निर्माण खड़ा करके यूपी शहरी नियोजन एवं विकास कानून, 1973 के प्रावधानों के उल्लंघन को भारी शुल्क लेकर नियमित करने का प्रयास किया गया है।”
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अदालत ने आगे कहा, “राज्य सरकार के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस कानून के उद्देश्य के मुताबिक कार्य करें ताकि अवैध निर्माण रोका जा सके और भारी रकम के भुगतान पर इस तरह के अवैध निर्माण को बढ़ावा ना मिले।”
उन्होंने कहा, “इस स्कीम से स्पष्ट रूप से ऐसे ईमानदार नागरिक हतोत्साहित होंगे जो 1973 के कानून के मुताबिक पूर्व अनुमति लेकर कानून का पालन करते हैं क्योंकि वे भवन उप नियमों में दिए गए सख्त नियमों का पालन करने को बाध्य होंगे। वहीं दूसरी ओर, कानून का उल्लंघन करने वालों को बड़े से बड़ा निर्माण खड़ा करने की अनुमति दी जाती है जिसकी भवन उप नियम में अनुमति नहीं है।”
अदालत ने कहा, “कंपाउडिंग स्कीम, 2020, धारा 32 सहित 1973 के कानून के दायरे से पूरी तरह से परे प्रतीत होती है। धारा 32 भवन योजना के विपरीत निर्माण बढ़ाने की अनुमति नहीं देती।”
अदालत ने राज्य सरकार को इस आदेश की जानकारी प्रदेश में सभी विकास प्राधिकरणों को देने का निर्देश दिया, जिससे इसका आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
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