कोलकाता, एक सितंबर पश्चिम बंगाल सरकार और राजभवन में बढ़ते मतभेदों के बीच, राज्य के शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि राज्यपाल राज्य विश्वविद्यालयों में अंतरिम कुलपतियों की नियुक्ति में मनमाने ढंग से काम कर रहे हैं।
बसु ने कहा कि यदि राज्यपाल सी वी आनंद बोस राज्य की सहमति के बिना कुलपतियों की एकतरफा नियुक्ति जारी रखते हैं तो सरकार कानूनी रास्ता अपनाने के लिए "मजबूर" होगी।
उन्होंने उन खबरों पर निराशा भी व्यक्त की कि राज्यपाल ने नियुक्तियां होने तक राज्य के 20 अन्य विश्वविद्यालयों में से 14 में कार्य निर्वहन की जिम्मेदारी ले ली है।
राज्यपाल के कदम के बारे में पूछे जाने पर बसु ने विधानसभा परिसर में संवाददाताओं से कहा, ‘‘राज्यपाल एक ही समय में किसी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और कुलपति कैसे हो सकते हैं। क्या एक ही चावल के दाने से बनी दो वस्तुएं एक ही हो सकती हैं? ऐसा लगता है कि राज्यपाल इस पर विश्वास करते हैं। पता नहीं कानून के किस प्रावधान के तहत वह ये चीजें कर रहे हैं। बोस लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार से परामर्श करने की परवाह किए बिना मनमर्जी से काम कर रहे हैं। अगर ऐसा ही जारी रहा तो हम कानूनी रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो जाएंगे।’’
शिक्षा मंत्री ने राज्य के उच्च शिक्षा विभाग और मंत्री से परामर्श किए बिना राज्यपाल द्वारा 31 राज्य विश्वविद्यालयों में से 11 में कुलपतियों की नियुक्ति पर बृहस्पतिवार को आपत्ति जतायी।
उन्होंने कहा, ‘‘यहां तक कि तीन बार की मुख्यमंत्री (ममता बनर्जी) से भी इस तरह की नियुक्ति से पहले परामर्श नहीं किया गया, जो एक जन प्रतिनिधि के अपमान से कम नहीं है। लेकिन हम अभी भी शिष्टाचार के तहत इस मुद्दे पर राज्यपाल के साथ चर्चा करना चाहते हैं।’’
पश्चिम बंगाल शिक्षाविद् मंच ने बृहस्पतिवार को राज्य से राजभवन के कदमों का जवाब देने में अधिक सक्रिय होने का आह्वान किया, जिसमें कुलपतियों की नियुक्ति भी शामिल है।
मंत्री ने कहा, ‘‘मुझे मंच द्वारा कुलपतियों की नियुक्तियों के बारे में बताया गया है। राज्य कानूनी प्रावधानों के अनुसार जवाब देगा। वह जो भी कर रहे हैं, हम उसके प्रति अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।’’
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दो महीने पहले एक फैसले में कहा था कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल द्वारा इन संस्थानों के पदेन कुलाधिपति के रूप में 11 राज्य-संचालित विश्वविद्यालयों में अंतरिम कुलपतियों की नियुक्ति में जारी आदेशों में कोई अवैधता नहीं है।
अदालत ने माना कि कुलाधिपति के पास कुलपतियों को नियुक्त करने की शक्ति है जो प्रासंगिक अधिनियमों में निर्धारित किया गया है।
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