ताजा खबरें | सरकार ने जम्मू-कश्मीर के ‘संवेदनशील’ मामले को ‘बहुत असंवेदनशील’ तरीके से संभाला: दिग्विजय सिंह

नयी दिल्ली, 11 दिसंबर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सोमवार को कहा कि सरकार ने जम्मू-कश्मीर के ‘संवेदनशील’ मामले को ‘बहुत असंवेदनशील’ तरीके से संभाला है। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों को पिछले चार वर्षों से प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।

उन्होंने राज्यसभा में कश्मीर से संबंधित दो विधेयकों पर चर्चा के दौरान कहा कि स्थानीय लोगों की इच्छा की अनदेखी की जा रही है और सरकार राज्य के बाहर से लाए गए अधिकारियों के माध्यम से ‘निरंकुश तरीके’ से काम कर रही है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा अचानक छीन लिया गया और अब सरकार इसे बहाल करने का प्रस्ताव कर रही है। सिंह ने आगे कहा कि जम्मू-कश्मीर का मामला संवेदनशील है और ‘‘हमें वहां की स्थिति को समझने की जरूरत है’’।

उन्होंने भाजपा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर जम्मू-कश्मीर के इतिहास के बारे में बात करते हुए तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया।

सिंह ने कहा, ‘‘अगर जम्मू कश्मीर और कश्मीर घाटी भारत के साथ है तो इसका श्रेय पंडित जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला को जाता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अमित शाह जी, जवाहरलाल नेहरू के बारे में कितना भी बोलें लेकिन तथ्य यह है कि कश्मीर घाटी नेहरू की वजह से भारत के साथ है, जिन्हें शेख अब्दुल्ला पर भरोसा था।’’

साल 2019 में सरकार के अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के कदम पर सिंह ने कहा कि इसके 90 प्रतिशत प्रावधान पहले से ही धीरे-धीरे भारतीय संविधान में आत्मसात हो गए थे और जब इसे निरस्त किया गया था तो शायद ही कुछ बचा था।

उन्होंने कहा कि घाटी में रोजाना आतंकवाद की घटनाएं होती हैं।

जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2023 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2023 पर सिंह ने कहा कि वह विस्थापित लोगों के लिए आरक्षण के पक्ष में हैं।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि वहां के स्थानीय लोगों के लिए वर्तमान आरक्षण को कम करने के बाद कहीं यह आरक्षण तो प्रदान किया जाएगा। सिंह ने आगे आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘ठेकेदार बाहर से आ रहे हैं। स्थानीय लोगों के पास कोई अधिकार नहीं है।’’

सिंह ने कहा, ‘‘वहां निरंकुश शासन है। स्थानीय लोगों से सलाह नहीं ली जाती है। अन्य राज्य कैडर के अधिकारियों को वहां लाया जाता है। पिछले चार साल से वहां कोई विधानसभा नहीं है। आप एक संवेदनशील राज्य के लिए असंवेदनशील तरीके से कानून लाए हैं और प्रशासन राज्य के बाहर से लाए गए लोगों के माध्यम से चलाया जाता है। स्थानीय लोगों की वहां कोई भागीदारी नहीं है।’’

हालांकि, उन्होंने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने वहां बहुत कठिन स्थिति में काम किया है।

उन्होंने यह भी कहा कि परिसीमन आयोग ने राज्य में एकतरफा तरीके से काम किया है।

सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को नजरबंद किए जाने का कारण भी जानना चाहा जैसा कि उन्होंने दिन में दावा किया था।

इस पर तुरंत जवाब देते हुए शाह ने कहा कि वहां कोई भी नजरबंद नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘‘उपराज्यपाल सुबह ही इस पर स्पष्टीकरण दे चुके हैं। वह अपनी मर्जी से कहीं भी जा सकती है। हम सुरक्षा भी मुहैया कराएंगे।’’

सिंह ने जवाब में गृह मंत्री पर कुछ टिप्पणी की, जिसके बाद सत्ता पक्ष की ओर से हंगामा शुरू हो गया। सदन के नेता पीयूष गोयल ने इसे उठाया और कहा कि यह गलत आरोप हैं।

इसके तुरंत बाद सभापति जगदीप धनखड़ ने सिंह की टिप्पणी को कार्यवाही से हटाने का निर्देश देते हुए कहा कि यह व्यक्तिगत टिप्पणी है।

बहस में भाग लेते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के जॉन ब्रिटास ने व्यंग्यात्मक लहजे में जवाहरलाल नेहरू के लिए एक मंत्रालय बनाने का सुझाव दिया।

इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह अद्भुत विडंबना है कि 1959 में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार को नेहरू ने गिरा दिया था लेकिन आज उन्हें इससे कोई गुरेज नहीं है।

इसका जवाब देते हुए ब्रिटास ने कहा, ‘‘इसलिए उन्हें (कांग्रेस को) सजा दी गई है और वे यहां बैठे हैं। अगर एसआर बोम्बाई मामले में कोई फैसला नहीं आया होता, तो वे ज्यादातर सरकारों को बर्खास्त कर देते।’’

भाजपा के राधा मोहन दास अग्रवाल ने कहा कि अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त किए जाने के बाद 2018 की 228 मुठभेड़ों की तुलना में 2023 में अब तक आतंकवादी घटनाओं की संख्या घटकर 41 रह गई है।

अग्रवाल ने कहा कि सरकार ने राज्य में दो एम्स और कुल सात मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है। उन्होंने कहा कि इसने विकास पर 58,478 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।

भाजपा की सीमा द्विवेदी और रामचंद्र जांगड़ा ने भी चर्चा में भाग लिया।

माकपा के वी शिवदासन ने मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता वहां आवाज उठाने में असमर्थ हैं।

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