नयी दिल्ली, 12 सितंबर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एन वी रमण ने शनिवार को कहा कि इन दिनों न्यायाधीश ‘मसालेदार गपशप’ और ‘निंदात्मक सोशल मीडिया पोस्ट’ का सामना कर रहे हैं क्योंकि वे खुद अपना बचाव करने से बचते हैं।
प्रधान न्यायाधीश बनने की कतार में सबसे आगे न्यायमूर्ति रमण ने कहा कि न्यायाधीश की जिंदगी दूसरे लोगों से बेहतर नहीं है और इस तरह का भ्रम है कि ‘न्यायाधीश अपने एकांतवासों में विलासिता का जीवन जीते हैं।
प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे ने कहा कि न्यायाधीशों की भी बोलने की आजादी उन्हीं कानूनों से नियंत्रित होती है जिनसे लोगों को न्यायपालिका के विरुद्ध कुछ भी मनचाहा बोलने से रोका जाता है।
वे उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आर भानुमति द्वारा लिखित पुस्तक ‘ज्यूडीशियरी, जजेज एंड द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ जस्टिस’ के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे। न्यायमूर्ति भानुमति 19 जुलाई को सेवानिवृत्त हुई थीं।
न्यायाधीशों की ये टिप्पणियां वकील प्रशांत भूषण से जुड़े एक विवाद की पृष्ठभूमि में आई हैं। शीर्ष अदालत ने न्यायपालिका के खिलाफ दो ट्वीट को लेकर आपराधिक अवमानना के दोषी ठहराये गये भूषण पर 31 अगस्त को एक रुपये का ‘मामूली जुर्माना’ लगाया था।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि भूषण ने न्याय प्रशासन की संस्था की साख को कमतर करने का प्रयास किया है।
न्यायमूर्ति रमण ने कहा कि पुस्तक का मुख्य भाव एक न्यायाधीश की जिम्मेदारियां और कर्तव्य है।
उन्होंने कहा, ‘‘न्यायाधीश खुद अपने बचाव में बोलने से बचते हैं और अब उन्हें आलोचनाओं का आसान निशाना बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया और तकनीक के प्रसार से यह विषय और जटिल हो गया है। न्यायाधीश मसालेदार गपशप और आलोचनात्मक सोशल मीडिया टिप्पणियों का सामना कर रहे हैं।’’
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