देश की खबरें | कृषि मंडियों और एमएसपी की प्रासंगिकता खत्म होने की आशंका : देवेंद्र शर्मा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कृषि संबंधी दो विधेयकों को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई है। सरकार और विपक्ष के इन विधेयकों को लेकर अपने तर्क हैं लेकिन क्या सही मायने में ये विधेयक किसानों के लिये हितकारी साबित होंगे और देश के कृषि क्षेत्र पर इसके क्या प्रभाव होंगे इसे लेकर जाने माने कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा से ‘भाषा’ के पांच सवाल और उनके जवाब :

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 20 सितंबर कृषि संबंधी दो विधेयकों को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई है। सरकार और विपक्ष के इन विधेयकों को लेकर अपने तर्क हैं लेकिन क्या सही मायने में ये विधेयक किसानों के लिये हितकारी साबित होंगे और देश के कृषि क्षेत्र पर इसके क्या प्रभाव होंगे इसे लेकर जाने माने कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा से ‘’ के पांच सवाल और उनके जवाब :

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प्रश्न: क्या इन विधेयकों से किसानों की वास्तविक समस्याएं खत्म होंगी? किसानों को इनसे एमएसपी के खत्म होने का डर है?

उत्तर: सरकार कह रही है कि इन विधेयकों के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या बाजार मंडियों (एपीएमसी) की व्यवस्था पर कोई असर नहीं होगा। एक तरफ यह आश्वासन दिया जा रहा है लेकिन शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश में केवल छह प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी मिल पाता है। 94 प्रतिशत किसान बाजार के हवाले हैं। सरकार को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि अगर बाजार किसानों के पक्ष में इतना तत्पर होता तो किसानों को बार-बार एमएसपी की मांग ही नहीं उठानी पड़ती। किसान क्यों एमएसपी की मांग करते?

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प्रश्न: विधेयक में प्रावधान है कि किसान स्थानीय मंडी के बजाए देश में जहां उपज का बेहतर मूल्य मिले उसे वहां बेच सकें। आप इसे कैसे देखते हैं?

उत्तर: सरकार अभी कह रही है कि उसने कृषि मंडियों (एमपीएमसी) और एमएसपी को कायम रखा है, लेकिन इस बात की पूरी आशंका है कि धीरे धीरे इन दोनों बातों की प्रासंगिकता खत्म हो जाये। कृषि मंडियों में कारोबारियों को मंडी शुल्क अदा करना होता है लेकिन जब वह बाहर खरीद करेंगे तो उन्हें कर नहीं देना होगा। ऐसे में एक-एक कर व्यापारी अपनी मांग को लेकर मंडी से बाहर जाने लगेंगे और मंडी एक बार खत्म हो गयी तो एमएसपी भी कहां मिलेगा?

प्रश्न: इससे देश की खाद्यान्न सुरक्षा या अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर क्या प्रभाव आयेगा?

उत्तर: देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार खुद कह रहे हैं कि देश में 67 प्रतिशत लोगों को सस्ता या सब्सिडीयुक्त राशन मिलता है। उन्होंने इस योजना के दायरे में आने वाली 67 प्रतिशत आबादी को कम कर 20 प्रतिशत करने की सलाह दी है। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की आवश्यकता कम होगी और खरीद की आवश्यकता भी कम हो जायेगी।

प्रश्न: किसानों की जमीन जाने का भय क्या सही है? उनके बीच विवाद की स्थिति में क्या होगा?

उत्तर: इस बात में कोई दो राय नहीं कि इन कानूनों के माध्यम से देश खेती की निगमित (कार्पोरेट) खेती संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर बड़ी कंपनियों के लिए स्टॉक रखने की सीमा हटा दी गई है। ठेका खेती तो बड़ी कंपनियां ही करायेंगी। आप ये क्यों नहीं कर सकते कि कंपनियां ठेका खेती करायें पर किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से किसी भी हालत में दाम कम न दिया जाये। किसी बड़ी कंपनी के साथ विवाद की स्थिति में किसानों को न्याय मिलने को लेकर आशंका है इसलिए उनके पक्ष को मजबूत करने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिये।

प्रश्न: इन कानूनों से क्या किसान नये कृषि उपकरणों, अच्छी गुणवत्ता के बीज और अन्य प्रौद्योगिकियों के साथ जरूरी अवसंरचना का लाभ उठाने की स्थिति में होंगे?

उत्तर: सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश खेती में आना चाहिये इसमें कोई दो राय नहीं है। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित हो यह किसानों की मूल चिंता है। इसी वजह से किसान, कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन की सिफारिशों को लागू करने की मांग करते आ रहे हैं। किसानों की आय वृद्धि दर या तो नकारात्मक है या घाटे में जा रही है। ऐसे में किसानों के पूरी तरह बाजार पर निर्भर होने के अपने खतरे हैं जिसे दूर करने के संबंध में सरकार को उपाय करना चाहिये। सरकार को यह व्यवस्था करनी चाहिये कि किसान देश में कहीं भी अपनी फसल बेचे लेकिन उसे एमएसपी से कम कीमत न मिले। देश के 60 करोड़ किसानों के हाथ पैसा आयेगा तो भारी मात्रा में मांग का सृजन होगा।

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